संजय साेलंकी का ब्लाग

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कभी कभी




कभी-कभी
हमें चलना होता है
तब भी,
जब कोई राह ना हो
और ना कोई राहगीर हो।
तब इस,
चलने की इस चाहत में
बिना पैरों के भी
हम नाप लेते है जीवन
जब चलते है पाँव-पाँव।


कभी-कभी
हमें तैरना होता है।
तब भी,
जब कोई नदी ना हो
और ना कोई किनारा हो!
तब भी,
इन लहरों को पार करके
हम तैरते जातें है
इस उम्मीद में,
कि आएगा कोई
आकर थामेगा हमारा हाथ
तब इस उम्मीद में
उथले बहते पानी में हम
चलने लगते है पाँव-पाँव।


कभी-कभी
हमें उड़ना होता है
तब भी,
जब कोई बादल ना हो
और उड़ने के लिए
ना ही खुला आसमान हो
ना किसी का संग हो
और ना ही अपना कोई पंख हो।


लेकिन फिर भी,
हम उड़ते है
क्योंकि इस जीवन में
कभी-कभी,
बिना पंखों के भी उड़ना पड़ता है।
और उड़ने की ख्वाहिश में
अक्सर इस
ज़मीन पर हम,
चलने लगते है पाँव-पाँव।


 


 

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कल

अगर कल
दिन बुरा था
तो रुकिये
गहरी सांस लीजिये
और उम्मीद रखिये
की आज दिन
बहुत अच्छा होगा।
और अगर
कल का दिन
अच्छा ही था
तो रुकिये नहीं
हो सकता है कि
सफलता का सिलसिला
अभी बस शुरू हुआ ही हो।


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- संजय © 2018


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यादें

ना मिटाओ मेरी यादों को
मेरी जगह दे दो
किसी ओर को
ऐसा तुमनें कहा था
लेकिन तुम्हें पता नहीं
ये सब इंसान के हाथों में नहीं
इसलिए शायद मुश्किल हैं
मुश्किल है, शायद नामुमकिन
क्योंकि तुम्हारी यादें
महज़ कोई याद नहीं
वो तो यादों से भरा
एक घोंसला है
और उस घोंसले में
अपना घर बनाकर
हर रोज़ मैं रहा करूँगा

वह घर
जो लगता है
अपना सा
किसी नए सपने सा
हाँ, जीवन के इस वृक्ष में
जब कोई पंछी रहने आएगा
मैं लाकर दूँगा उसे दाना-पानी
रखूँगा खूब ख्याल
कभी साथ खेलूँगा
तो कभी कोई गीत सुनाऊंगा

गीत सुनते हुए
समय दौड़ेगा
तेज़ रफ़्तार से
और वृक्ष फले-फूलेगा
बड़े ही प्यार से
लेकिन अबके जो आएगा
वो बनाएगा
एक नया घोंसला
जो होगा
पिछले घोंसले से बेहतर
बेहतर होंगे तिनके
और बेहतर होगी दुनिया
जिसमे वो नया पंछी गायेगा
और दुनिया को
अपनी मौजूदगी का एहसास कराएगा
उसमें होगी लाखों खूबियां
वो खुशियों को
एक नए सिरे से सजायेगा
फिर भी तुम्हारी जगह
कोई और नहीं ले पायेगा

जीवन के खेल में
कोई दूसरा मौका नहीं मिलता
इसलिए इस कमी को भरने के लिए
हर रोज़
कतरा-कतरा
कुछ यादें मिटा रहा हूँ
वजह चाहे जो भी हो
तुम्हारी यादें मेरी निजी है
ठीक वैसे ही
जैसे मेरा जीवन
अब किसी ओर की निधि है
चाहे मैं खुद
तुम्हें भूल जाऊँगा
लेकिन तुम्हारी जगह
किसी ओर को नहीं दे पाउँगा!
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- संजय © 2018


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सुबह की कविता

sanjay.jpg




सुबह मस्जिद की अज़ान,
मंदिर में घंटियों की आवाज़े..
नन्हे पंछियों का कलरव,
और उनकी बुलंद परवाज़ें..
जब बादलो की कैद से आज़ाद हुआ सूरज,
चाँद ने अंदर जाकर बंद कर लिये दरवाजें..

© संजय
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एक सीधा-सादा इंसान! घोर पारिवारिक! घुमक्कड़! चाय प्रेमी! सिनेमाई नशेड़ी! माइक्रो-फिक्शन लेखक!

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