संजय साेलंकी का ब्लाग

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एक सपना और सात प्रयास






"सपने वो नहीं होते, जो आप सोने के बाद देखते हैं, सपने वो होते हैं.. जो आपको सोने नहीं देते।" एपीजे अब्दुल कलाम ने जब ये बात कही होगी, कई कहानियां इसके इर्द-गिर्द बुनी गई होगी। जिद, जुनून और सफलता की कई कहानियां सुनीं होंगीं परंतु यह कहानी कुछ अजीब सी जिद की है। एक होनहार लड़का जो इंजीनियर बन चुका था, अपने गांव में एक हायर सेकेंड्री स्कूल खोलना चाहता था। उसे पता चला कि गांव में स्कूल तो केवल कलेक्टर ही खुलवा सकता है। बस फिर क्या था, नौकरी छोड़ी, पार्टटाइम वेटर का काम किया और आईएएस की तैयारी शुरू कर दी। 1-2-3 नहीं लगातार 6 बार फेल हुआ लेकिन हार नहीं मानी और 7वीं बार यूपीएससी क्लीयर। अब जयगणेश एक आईएएस अफसर है।

जयागणेश के पिता गरीब थे। लेदर फैक्टरी में सुपरवाइजर का काम कर हर महीने सिर्फ 4,500 तक ही कमा पाते थे। परिवार में अक्सर पैसों में कमी रहती थी। चार भाई-बहनों में जयागणेश सबसे बड़े थे ऐसे में बड़े होने के कारण घर की खर्च की जिम्मेदारी भी उन पर ही थी। बता दें, वह शुरू से ही पढ़ाई में अच्छे थे। 12वीं में उनके 91 प्रतिशत अंक आए थे। फिर उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू कर दी।

इंजीनियरिंग की डिग्री मिलने के बाद इन्हें 25,000 प्रति महीना पर एक नौकरी भी मिल गई, लेकिन जल्द ही उन्हें यह एहसास होने लगा कि शिक्षा उनके गांव के बच्चों के लिए भी बेहद जरूरी है। क्योंकि उन्हें गांव के पिछड़ेपन और बच्चों के स्कूल न जाने पर दुख होता था। उन्होंने बताया- उनके गांव के अधिकतर बच्चे 10वीं तक ही पढ़ाई कर पाते थे और कई बच्चों को तो स्कूल का मुंह ही देखना नसीब नहीं होता था। जयगणेश बताते हैं, कि उनके गांव के दोस्त ऑटो चलाते हैं या शहरों में जाकर किसी फैक्ट्री में मजदूरी करते हैं। अपने दोस्तों में वह इकलौते थे जो यहां तक पहुंचे थे।

इसी दौरान उन्हें पता चला कि बदलाव तो केवल कलेक्टर ही ला सकते हैं। इसलिए उन्होंने अपना जॉब छोड़ा और सिविल सर्विस की तैयारी करने शुरू कर दी। जल्द ही किसी से भी मार्गदर्शन नहीं मिलने के कारण रास्ता कठिन दिखने लगा। अपने पहले दो प्रयास में तो ये प्रारंभिक परीक्षा भी नहीं पास कर पाए। बाद में उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग के जगह सोशियोलॉजी को चुना। इसका भी फायदा नहीं हुआ और यह तीसरी बार में भी फेल हो गए।

जिसके बाद उन्हें चेन्नई में सरकारी कोचिंग के बारे में मालूम चला जहां आईएएस की कोचिंग की तैयारी करवाई जाती है। तैयारी करने के लिए ये चेन्नई चले गए। वहां एक सत्यम सिनेमा हॉल के कैंटीन में बिलिंग ऑपरेटर के तौर पर काम मिल गया। जिसके बाद उन्हें इंटरवल के वक्त उन्हें वेटर का काम करना पड़ता था। उन्होंने बताया मुझे मेरा बस एक ही मकसद था। कैसे भी करके IAS ऑफिसर बनना चाहता हूं।

जयागणेश ने काफी मेहनत से पढ़ाई की, फिर भी पांचवी बार में सफलता हासिल नहीं कर पाए। आगे पढ़ाई करने के लिए पैसे की कमी बहुत ज्यादा आड़े आ रही थी। अब उन्होंने यूपीएससी की तैयारी कराने वाले एक कोचिंग में सोशियोलॉजी पढ़ाना शुरू कर दिया। अपने छठे प्रयास में उन्होंने प्रारंभिक परीक्षा तो पास कर ली लेकिन इंटरव्यू पास करने से चूक गए।

छठीं बार असफल होने के बाद भी उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। जिसके बाद उन्होंने 7वीं बार यूपीएससी की परीक्षा दी। जब वे 7वीं बार परीक्षा में बैठे तो प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू भी पास कर गए। उन्हें 7वीं बार में 156वी रैंक मिल गई। और आखिरकार एक सपने का संघर्ष कामयाब हुआ।
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झील और ग्लास : Zen Story in Hindi






एक बार एक युवक किसी ज़ेन गुरु के पास जाकर बोला: "गुरुदेव, मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ, कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं!"

गुरु बोले: "पानी के ग्लास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो।"

युवक ने ऐसा ही किया..!

फिर गुरु ने युवक से पूछा: "इसका स्वाद कैसा लगा?"

युवक थूकते हुए बोला: "बहुत ही खराब… एकदम खारा!"

फिर गुरु मुस्कुराते हुए बोले: "एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक ले लो और मेरे साथ आओ।"

दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने जाकर रुक गए।

गुरु ने पुनः कहा: अब इस नमक को पानी में दाल दो।"

युवक ने ऐसा ही किया...

गुरु बोले: अब इस झील का पानी पियो।

युवक पानी पीने लगा......

एक बार फिर गुरु ने पूछा: "बताओ इसका स्वाद कैसा है? क्या अभी भी तुम्हे ये खरा लग रहा है?!"

"नहीं, ये तो मीठा है, बहुत अच्छा है", युवक बोला।

अब गुरु युवक के बगल में आकर बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले, "जीवन के दुःख बिल्कुल नमक की तरह हैं; न इससे कम ना ज्यादा। जीवन में दुःख की मात्र वही रहती है, बिल्कुल वही। लेकिन हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं ये इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं।

इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो.. कि खुद को बड़ा कर लो... ग़्लास मत बने रहो!!
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जलन : A story about jealousy






एक समय की बात है। किसी राज्य में चार ब्राम्हण रहते थे। एक दिन उन चारों ने तपस्या करके भगवान को खुश करने और भगवान के आशीर्वाद से अपनी मनो-कामना पूरी करने का विचार किया।

ऐसा विचार करके चारो ब्राम्हण जंगल की तरफ चले गए और तपस्या करने लगे। मौसम बीतें लेकिन उनकी तपस्या अनवरत जारी रही।

अंततः उनकी कठिन तपस्या से भगवान प्रसन्न हो गए और उनके सामने प्रकट हो गए और कहने लगे मैं तुम चारो की तपस्या से खुश हूँ। मांगों, क्या वर मांगते हो!

पहले ब्राम्हण ने कहा भगवान मुझे इस संसार का सबसे आमिर आदमी बना दो। भगवान ने कहा.. तथास्तु! और वह संसार का सबसे अमीर आदमी बन गया।

फिर भगवान ने दूसरे ब्राम्हण से कहा: मैं तुमसे भी खुश हूँ, तुम भी वर मांगों।

दूसरे ब्राम्हण ने कहा मुझे संसार का सबसे सुन्दर इंसान बना दो। भगवान ने फिर कहा.. तथास्तु! और वह संसार में सर्वाधिक सुंदर इंसान बन गया।

फिर भगवान ने तीसरे ब्राम्हण से कहा: मांगो, तुम क्या मांगते हो वत्स!

तीसरे ब्राम्हण ने कहा मुझे दुनिया का सबसे होशियार इंसान बना दो! भगवान नें कहा, तथास्तु!

फिर भगवान ने चौथे ब्राम्हण से कहा, मांगों.. तुम क्या मांगते हो वत्स!?

चौथे ब्राम्हण ने कहा: भगवान मुझे तो बस इतना वर दीजिए की ये तीनो जैसे थे वैसे ही हो जाए।

... अगर किन्ही दो बराबर लकीरों में से पहली को बड़ी बनाना है तो दूसरी लकीर को मिटाकर छोटी करने की बजाये पहली को ही और आगे बड़ा देना चाहिए।

ठीक उसी प्रकार इंसान को भी दूसरे को छोटा करने से बेहतर खुद को बड़ा या बेहतर बनाना चाहिए। क्योंकि दूसरे की प्रगति रोकने के चक्कर में वो खुद की प्रगति भी कम कर सकते है।

... जैसे अगर चौथा ब्राम्हण अपने लिए भी कुछ अच्छा मांग लेता तो भगवान उसे भी दे देते पर उसने जलकर अपने ही तीनो दोस्तों का नुकसान तो किया तो साथ में खुद का भी नुकसान कर लिया!
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स्वयंवर






कहीं किसी नदी के किनारे एक मुनियों का आश्रम था। वहाँ एक मुनिवर रहते थे।

एक दिन जब मुनि नदी के किनारे जल लेकर आचमन कर रहे थे कि अचानक उनकी पानी से भरी हथेली में ऊपर से एक चुहिया आकर गिर गई।

उस चुहिया को आकाश में एक बाज लिये जा रहा था। उसके पंजे से छूटकर वह नीचे गिर गई थी।

मुनि ने उसे पीपल के पत्ते पर रखा और फिर से गंगाजल में स्नान किया। चुहिया में अभी प्राण शेष थे। उसे मुनि ने अपने प्रताप से एक सुंदर कन्या का रुप दे दिया, और अपने आश्रम में ले आये।

मुनि नें अपनी पत्‍नी को कन्या अर्पित करते हुए कहा कि इसे अपनी ही लड़की की तरह पालना।

मुनि की अपनी कोई सन्तान नहीं थी, इसलिये मुनिपत्‍नी ने उसका लालन-पालन बड़े प्रेम से किया। युवावस्था तक वह उनके आश्रम में ही पलती रही।

जब कन्या की विवाह योग्य अवस्था हो गई तो मुनिपत्‍नी ने मुनि से कहा - "हे स्वामी! हमारी कन्या अब विवाह योग्य हो गई है। अतः इसके विवाह का प्रबन्ध कीजिये।"

मुनि ने कहा - "मैं अभी सूर्य को बुलाकर इसे उसके हाथ सौंप देता हूँ। यदि इसे स्वीकार होगा तो उसके साथ विवाह कर लेगी, अन्यथा नहीं।

मुनि ने पूछा: "हे पुत्री! यह त्रिलोक को प्रकाश देने वाला सूर्य, तुम्हें पतिरूप में स्वीकार है?"

पुत्री ने उत्तर दिया - "पिताश्री! यह तो आग जैसा गरम है, मुझे स्वीकार नहीं.. इससे अच्छा कोई वर बुलाइये।"

मुनि ने सूर्य से पूछा कि वह उससे श्रेष्ठ कोई वर बतलाये।

सूर्य ने कहा - "मुझ से अच्छे तो मेघ हैं, जो मुझे ढँककर छिपा लेते हैं।"

मुनि ने मेघ को बुलाकर अपनी पुत्री से पूछा - "क्या यह तुझे पतिरूप में स्वीकार है?"

कन्या ने कहा - "यह तो बहुत काला है.. अतः इससे भी अच्छे किसी वर को बुलाओ।"

मुनि ने मेघ से भी पूछा कि उससे अच्छा कौन है.. मेघ ने कहा, "मुझ से अच्छे तो वायुदेव हैं, जो मुझे उड़ाकर विभिन्न दिशाओं में ले जाते है।"

मुनि ने वायुदेव को बुलाया और पुनः कन्या से स्वीकृति पूछी।

कन्या ने कहा - "पिताश्री! यह तो बड़े ही चंचल है। इनसे भी किसी अच्छे वर को बुलाओ।"

मुनि ने वायुदेव से भी पूछा कि उनसे श्रेष्ठ कौन है.. वायुदेव ने कहा, "मुझ से श्रेष्ठ पर्वत है, जो बड़ी से बड़ी आँधी में भी स्थिर रहता है।"

मुनि ने पर्वत को बुलाया और पुनः अपनी कन्या से पूछा तो उस ने कहा - "पिताश्री! यह तो बड़ा कठोर और गंभीर है, इससे अधिक अच्छा कोई वर बुलाओ।"

मुनि ने पर्वत से कहा कि वह अपने से श्रेष्ठ कोई वर सुझाये। तब पर्वत ने कहा - "मुझ से अच्छा चूहा है, जो मुझे तोड़कर अपना बिल बना लेता है।"

मुनि ने तब चूहे को बुलाया और पुनः कन्या से कहा - "पुत्री! यह चूहा तुझे स्वीकार हो तो इससे विवाह कर ले।"

मुनिकन्या ने चूहें को बड़े ध्यान से देखा। उसके साथ उसे विलक्षण अपनापन अनुभव हो रहा था।

प्रथम दृष्टि में ही वह उस पर मुग्ध हो गई और बोली - "हे पिताश्री! मुझे यह स्वीकार है। आप मुझे चुहिया बनाकर इन चूहे जी के हाथों सौंप दीजिये।"

मुनि ने अपने तपोबल से उसे फिर चुहिया बना दिया और चूहे के साथ उसका विवाह कर दिया।
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गुण - दोष : Story of two buckets






किसी गाँव में एक व्यक्ति को बहुत दूर से पीने के लिए पानी भरकर लाना पड़ता था। उसके पास दो बाल्टियाँ थीं जिन्हें वह एक डंडे के दोनों सिरों पर बांधकर उनमें तालाब से पानी भरकर लाता था।

उन दोनों बाल्टियों में से एक के तले में एक छोटा सा छेद था जबकि दूसरी बाल्टी बहुत अच्छी हालत में थी।

तालाब से घर तक के रास्ते में छेद वाली बाल्टी से पानी रिसता रहता था और घर पहुँचते-पहुँचते उसमें आधा पानी ही बचता था। बहुत लम्बे अरसे तक ऐसा रोज़ होता रहा और किसान सिर्फ डेढ़ बाल्टी पानी लेकर ही घर आता रहा।

अच्छी बाल्टी को यह देखकर अपने ऊपर घमंड हो गया। वह छेदवाली बाल्टी से कहती थी की वह अच्छी बाल्टी है और उसमें से ज़रा सा भी पानी नहीं रिसता। छेदवाली बाल्टी को यह सुनकर बहुत दुःख होता था और उसे अपनी कमी पर शर्म आती थी।

छेदवाली बाल्टी अपने जीवन से पूरी तरह निराश हो चुकी थी। एक दिन रास्ते में उसने किसान से कहा:
मैं अच्छी बाल्टी नहीं हूँ! मेरे तले में छोटे से छेद के कारण पानी रिसता रहता है और तुम्हारे घर तक पहुँचते-पहुँचते मैं आधी खाली हो जाती हूँ।

तब किसान ने छेदवाली बाल्टी से कहा:
क्या तुम देखती हो कि रास्ते में जिस ओर तुम होती हो वहाँ हरियाली है और फूल खिलते हैं लेकिन दूसरी ओर नहीं।

ऐसा इसलिए है कि क्योंकि मैं तुम्हारे तरफ की पगडण्डी में फूलों और पौधों के बीज छिड़कता रहता था जिन्हें तुमसे रिसने वाले पानी से सिंचाई लायक नमी मिल जाती थी।

दो सालों से मैं इसी वजह से ईश्वर को फूल चढ़ा पा रहा हूँ। यदि तुममें वह बात नहीं होती जिसे तुम अपना दोष समझती हो तो हमारे आसपास इतनी सुन्दरता नहीं होती।

.... दोष सबमें होते है। लेकिन हर दोष की बुराई करने की बजाए उसका सही विकल्प तलाश करना चाहिए। क्योंकि कुछ दोष अच्छे हो सकते है।
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पिता, पुत्र और एक सपना : Story of Brooklyn bridge






इंजीनियर जॉन रोबलिंग के जीवन में सन 1883 एक महत्वपूर्ण वर्ष था। इस वर्ष वह न्यूयॉर्क से लांग आईलैंड को जोड़ने के लिए एक शानदार पुल का निर्माण करने के अपने विचार पर अमल करने वाले थे।

यह दुनिया का पहला स्टील वायर सस्पेंशन से बना पुल था और दुनिया में इस तरह का कोई दूसरा पल नहीं बना था, इसलिए यह चर्चा का विषय था। विशेषज्ञों ने इसे एक असंभव उपलब्धि कह कर उनके इस विचार को खारिज कर दिया था। पूरी दुनिया उनके विचार के खिलाफ थी और उन्हे योजना बंद करने के लिए कहा गया।

रोबलिंग की अंतरात्मा उनसे हर पल कहती थी कि उनकी राय पुल के बारे में सही है। रोबलिंग को उसके विचार के लिए सिर्फ एक आदमी का समर्थन प्राप्त था और वो था उनका बेटा वाशिंगटन। वाशिंगटन भी एक इंजिनियर था।

उन्होंने एक विस्तृत योजना तैयार की और आवश्यक टीम को भर्ती किया। उन्होंने पुल निर्माण का काम शुरू किया लेकिन कार्यस्थल पर हुई एक अनहोनी दुर्घटना मे रोबलिंग की मृत्यु हो गई।

आम तौर पर कोई और होता तो इस कार्य को छोड़ देता, लेकिन वाशिंगटन ने अपने पिता का काम पूरा करने का निर्णय लिया क्योंकि उन्हे अपने पिता के सपने पर यकीन था।

इसके बाद एक और अनहोनी हुई। एक दुर्घटना में वाशिंगटन को मस्तिष्क क्षति का सामना करना पड़ा और वह स्थिर हो गये। उन्हे इस हद तक पैरालिसिस हो गया कि न तो चल सकते थे और न ही बात कर सकते थे। यहाँ तक कि वह हिल भी नहीं सकते थे।

वाशिंगटन इतनी खराब तबियत के बावजूद निर्माण कार्य जारी रखना चाहते थे। उन्हे किसी भी हाल में पिता का सपना पूरा करना था।

वह बातचीत करने के लिए अपनी पत्नी पर पूरी तरह से निर्भर करते थे। उन्होंने पत्नी से बातचीत करने के लिए अपनी एक स्वस्थ उंगली का इस्तेमाल किया। अपनी बात संपूर्णता से समझाने हेतु एक कोड प्रणाली विकसित की।

अगले 13 सालों तक उस एक उंगली के दम पर उनकी पत्नी ने उनके निर्देशों को समझा। समझने के बाद वह उन्हे इंजीनियरों को समझाया करती थी।

इंजिनियर उसके निर्देशों पर काम करते गए और आखिरकार ब्रुकलिन ब्रिज हकीकत में बन कर तैयार हो गया।

आज ब्रुकलिन ब्रिज एक शानदार उदाहरण के रूप मे बाधाओं का सामना करने वाले लोगों के लिए एक प्रेरणादायक कहानी के रूप में खड़ा है।

कोई सोच भी नहीं सकता था कि बिस्तर पर लेटा एक इंसान सिर्फ एक ऊंगली के सहारे इतनी बड़ी उपलब्धि हांसिल कर लेगा।

इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि:

1. दूसरों के मजाक उड़ाने के बावजूद हमें बड़े सपने देखना नहीं छोड़ना चाहिए।
2. शारिरिक अंपगता, कठिन परिस्थिती और मुश्किलों को भी हौंसलो के दम पर हराया जा सकता है।
3. दुनिया की सभी सफल लोगों में एक बात समान है कि उन्होंने असाधारण दिक्कतों का सामना किया था।
4. कहते है, "मन के हारे हार है, मन के जीते जीत" यानी कि जब तक आप अपने मन से नहीं हारते, तब तक दुनिया की कोई ताकत आपको नहीं हरा सकती।
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मछलियों की खुशी

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एक दिन च्वांग-त्जु और उनका दोस्त एक तालाब के किनारे बैठे हुए थे।

च्वांग-त्जु ने अपने दोस्त से कहा – उन मछलियों को तैरते हुए देखो! वे कितनी खुश हैं।

तुम खुद तो मछली नहीं हो – उनके दोस्त ने कहा... फ़िर तुम यह कैसे जानते हो कि वे खुश हैं?

तुम भी तो मैं नहीं हो.. च्वांग-त्जु ने कहा... फ़िर तुम यह कैसे जानते हो कि मैं यह नहीं जानता कि मछलियाँ खुश हैं?!
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Musibat se saamna : नेपोलियन बोनापार्ट






नेपोलियन बोनापार्ट विश्व के सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं में से एक थे। वे अक्सर जोखिम भरे काम किया करते थे।

एक बार उन्होने आलपास पर्वत को पार करने का ऐलान किया और अपनी सेना के साथ चल पढ़े।

सामने एक विशाल और गगनचुम्बी पहाड़ खड़ा था जिसपर चढ़ाई करना लगभग असंभव था।

उस विशाल पहाड़ को देखकर नेपोलियन की सेना मे अचानक हलचल की स्थिति पैदा हो गई। लेकिन फिर भी उन्होंने अपनी सेना को चढ़ाई का आदेश दिया।

पास मे ही एक बुजुर्ग औरत खड़ी थी। उसने जैसे ही यह सुना वो उसके पास आकर बोली की क्यो मरना चाहते हो..?

यहाँ जितने भी लोग आये है वो मुँह की खाकर हमेशा के लिये यही रहे गये। अगर अपनी ज़िंदगी से प्यार है तो वापिस चले जाओ।

उस औरत की यह बात सुनकर नेपोलियन नाराज़ होने की बजाये प्रेरित हो गया और झट से हीरो का हार उतारकर उस बुजुर्ग महिला को पहना दिया.. और फिर बोले; आपने मेरा उत्साह दोगुना कर दिया और मुझे प्रेरित किया है। लेकिन अगर मै जिंदा बचा तो आप मेरी जय-जयकार करना।

उस औरत ने नेपोलियन की बात सुनकर कहा- तुम पहले इंसान हो जो मेरी बात सुनकर हताश और निराश नहीं हुए।

‘जो करने या मरने‘ और मुसीबतों का सामना करने का इरादा रखते है, वह लोग कभी नही हारते।
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Musafir : एक छोटी कहानी






एक अजनबी मुसाफ़िर किसी गाँव में पहुँचा। गाँव में दाखिल होते ही उसे कुछ लोग मिल गए। एक बुज़ुर्ग को संबोधित करते हुए उसने पूछा, इस गाँव के लोग कैसे हैं? क्या वे अच्छे और मददगार हैं??

बुज़ुर्ग ने अजनबी के सवाल का सीधे जवाब नहीं दिया, उल्टे एक सवाल कर दिया, मेरे भाई! तुम जहाँ से आए हो वहाँ के लोग कैसे हैं? क्या वे अच्छे और मददगार हैं?

वह अजनबी अत्यंत रुष्ट और दुःखी होकर बोला, मैं क्या बताऊँ? मुझे तो बताते हुए भी दुःख होता है कि मेरे गाँव के लोग अत्यंत दुष्ट हैं।
इसलिए मैं वह गाँव छोड़कर आया हूँ।

लेकिन आप यह सब पूछकर मेरा मन क्यों दुखा रहे हैं?
बुज़ुर्ग बोला, मैं भी बहुत दुःखी हूँ। इस गाँव के लोग भी वैसे ही हैं। तुम उन्हें उनसे भी बुरा पाओगे।

तभी एक और राहगीर आ गया। उसने भी उस बुज़ुर्ग से यही सवाल किया, इस गाँव के लोग कैसे हैं?

बुज़ुर्ग ने भी फिर से वही सवाल पूछा.. पहले तुम बताओ जहाँ से तुम आये हो, वहाँ के लोग कैसे हैं?

राहगीर यह सुनकर मुस्करा दिया। उसके चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई। उसने कहा कि मेरे गाँव के लोग इतने अच्छे हैं कि उनकी स्मृति मात्र से सुख की अनुभूति होती है।

वह गाँव छोड़ते हुए मुझे दुःख है, लेकिन रोज़गार की तलाश यहाँ तक मुझे ले आई है। इसलिए पूछ रहा हूँ कि यह गाँव कैसा है?

... बुज़ुर्ग बोला, मेरे भाई! यह गाँव भी वैसा ही है। यहाँ के लोग भी उतने ही अच्छे हैं!!
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Ant & Leaf : चींटी और पत्ता






किसी जंगल में एक बहुत बड़ा तालाब था तालाब के पास एक बगीचा था। जिसमे अनेक प्रकार के पेड़-पौधे लगे थे। दूर- दूर से लोग वहाँ आते और बगीचे की तारीफ करते।

गुलाब के पेड़ पे लगा पत्ता हर रोज लोगों को आते-जाते और फूलों की तारीफ करते देखता, उसे लगता की हो सकता है एक दिन कोई उसकी भी तारीफ करे।

पर जब काफी दिन बीत जाने के बाद भी किसी ने उसकी तारीफ नहीं की तो वो काफी हीन महसूस करने लगा।

उसके अंदर तरह-तरह के विचार आने लगे- सभी लोग गुलाब और अन्य फूलों की तारीफ करते नहीं थकते पर मुझे कोई देखता तक नहीं, शायद मेरा जीवन किसी काम का नहीं…कहाँ ये खूबसूरत फूल और कहाँ मैं.. और ऐसे विचार सोच कर वो पत्ता काफी उदास रहने लगा।

दिन यूँ ही बीत रहे थे कि एक दिन जंगल में बड़ी जोर-जोर से हवा चलने लगी और देखते-देखते उसने आंधी का रूप ले लिया।

बगीचे के पेड़-पौधे तहस-नहस होने लगे, देखते-देखते सभी फूल ज़मीन पर गिर कर निढाल हो गए।

पत्ता भी अपनी शाखा से अलग हो गया और उड़ते-उड़ते तालाब में जा गिरा।

पत्ते ने देखा कि उससे कुछ ही दूर पर कहीं से एक चींटी हवा के झोंको की वजह से तालाब में आ गिरी थी और अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष कर रही थी।

चींटी प्रयास करते-करते काफी थक चुकी थी और उसे अपनी मृत्यु तय लग रही थी कि तभी पत्ते ने उसे आवाज़ दी, घबराओ नहीं.. आओ.. मैं तुम्हारी मदद कर देता हूँ!

और ऐसा कहते हुए अपनी उपर बैठा लिया।आंधी रुकते-रुकते पत्ता तालाब के एक छोर पर पहुँच गया; चींटी किनारे पर पहुँच कर बहुत खुश हो गयी और बोली, आपने आज मेरी जान बचा कर बहुत बड़ा उपकार किया है। सचमुच आप महान हैं, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!

यह सुनकर पत्ता भावुक हो गया और बोला, धन्यवाद तो मुझे करना चाहिए, क्योंकि तुम्हारी वजह से आज पहली बार मेरा सामना मेरी काबिलियत से हुआ..
जिससे मैं आज तक अनजान था। आज पहली बार मैंने अपने जीवन के मकसद और अपनी ताकत को पहचान पाया हूँ।
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A Lesson : एक सबक






एक बार एक टीचर क्लास में पढ़ा रहे थे। बच्चों को कुछ नया सिखाने के लिए टीचर ने जेब से 100 रुपये का एक नोट निकाला। अब बच्चों की तरफ वह नोट दिखाकर कहा – बच्चों, क्या आप लोग बता सकते हैं कि यह कितने रुपये का नोट है?

बच्चों ने एक साथ कहा – “100 रुपये का”!

टीचर – इस नोट को कौन-कौन लेना चाहेगा? सभी बच्चों ने हाथ खड़ा कर दिया।

अब उस टीचर ने उस नोट को मुट्ठी में बंद करके बुरी तरह मसला, जिससे वह नोट बुरी तरह कुचल सा गया। अब टीचर ने फिर से बच्चों को नोट दिखाकर कहा कि अब यह नोट कुचल सा गया है, अब इसे कौन लेना चाहेगा?

सभी बच्चों ने फिर हाथ उठा दिया।

अब उस टीचर ने उस नोट को जमीन पर फेंका और अपने जूते से बुरी तरह कुचल कर टीचर ने नोट उठाकर फिर से बच्चों को दिखाया और पूछा कि अब इसे कौन लेना चाहेगा?

सभी बच्चों ने फिर से हाथ उठा दिया।

अब टीचर ने कहा कि बच्चों आज मैंने तुमको एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ाया है। ये 100 रुपये का नोट था, जब मैंने इसे हाथ से कुचला तो ये नोट कुचल गया, लेकिन इसकी कीमत 100 रुपये ही रही, इसके बाद जब मैंने इसे जूते से मसला तो ये नोट गन्दा हो गया, लेकिन फिर भी इसकी कीमत 100 रुपये ही रही।

ठीक वैसे ही इंसान की जो कीमत है और इंसान की जो काबिलियत है वो हमेशा वही रहती है। आपके ऊपर चाहे कितनी भी मुश्किलें आ जाएँ, चाहें जितनी मुसीबतों की धूल आपके ऊपर गिरे लेकिन आपको अपनी कीमत नहीं गंवानी है। आप कल भी बेहतर थे और आज भी बेहतर हैं।
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Motivational Frog : मोटिवेशनल मेंडक








बहुत समय पहले की बात है एक तालाब में बहुत सारे मेंढक रहते थे। तालाब के बीचों-बीच एक बहुत पुराना धातु का खम्भा भी लगा हुआ था जिसे उस सरोवर को बनवाने वाले राजा ने लगवाया था। खम्भा काफी ऊँचा था और उसकी सतह भी बिलकुल चिकनी थी।

एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया कि क्यों ना एक रेस करवाई जाए। रेस में भाग लेने वाली प्रतियोगीयों को खम्भे पर चढ़ना होगा, और जो सबसे पहले ऊपर पहुच जाएगा वही विजेता माना जाएगा।

रेस का दिन आ पंहुचा, चारो तरफ बहुत भीड़ थी.. आस -पास के इलाकों से भी कई मेंढक इस रेस में हिस्सा लेने पहुचे थे और माहौल में सरगर्मी थी। हर तरफ शोर ही शोर था।

रेस शुरू हुई …

…लेकिन खम्भे को देखकर भीड़ में एकत्र हुए किसी भी मेंढक को ये यकीन नहीं हुआकि कोई भी मेंढक ऊपर तक पहुंच पायेगा।

हर तरफ यही सुनाई देता …

...अरे ये बहुत कठिन है!

...वो कभी भी ये रेस पूरी नहीं कर पायंगे!

... सफलता का तो कोई सवाल ही नहीं। इतने चिकने खम्भे पर चढ़ा ही नहीं जा सकता!

और यही हो भी रहा था, जो भी कोई मेंढक कोशिश करता.. वो थोडा ऊपर जाकर नीचे गिर जाता।

कई मेंढक दो -तीन बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में लगे हुए थे…

पर भीड़ तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी.. ये नहीं हो सकता.. नामुमकिन है ये तो.. और वो उत्साहित मेंढक भी ये सुन-सुनकर हताश हो गए और अपना प्रयास छोड़ दिया।

लेकिन उन्ही मेंढकों के बीच एक छोटा सा मेंढक था, जो बार -बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर चढ़ने में लगा हुआ था.. वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा, वो हर बार गिरता और हर बार चढ़ता...

.....और देखते ही देखते वह खम्भे के ऊपर चढ़ गया!

उसकी जीत पर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ, सभी मेंढक उसे घेर कर खड़े हो गए और उससे पूछने लगे, तुमने ये असंभव काम कैसे कर दिखाया.. भला तुम्हे अपना लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति कहाँ से मिली, ज़रा हमें भी तो बताओ कि तुम इस खम्भे पर कैसे चढ़े?


..उसने इशारे से कहा... वो बहरा है.. वो सुन नहीं सकता है!!
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तीन चीटियाँ : Khalil Jibran






एक व्यक्ति धूप में गहरी नींद में सो रहा था। तीन चीटियाँ उसकी नाक पर आकर इकट्ठी हुईं। तीनों ने अपनी प्रथा अनुसार एक दूसरे का अभिवादन किया और फिर वार्तालाप करने लगीं।

पहली चीटीं ने कहा, "मैंने इन पहाड़ों और घाटियों से अधिक बंजर जगह और कोई नहीं देखी। मैं यहाँ सारा दिन अन्न ढ़ूँढ़ती रही, किन्तु मुझे एक दाना तक नहीं मिला।"

दूसरी चीटीं ने कहा, "मुझे भी कुछ नहीं मिला, यद्यपि मैंने यहाँ का चप्पा-चप्पा छान मारा। मुझे लगता है कि यही वह कोमल और अस्थिर जगह है, जिसके बारे में हमारे लोग कहते हैं कि यहाँ कुछ पैदा नहीं होता।"

तब तीसरी चीटीं ने अपना सिर उठाया और कहा, "मेरी सहेलियो! इस समय हम सबसे बड़ी चींटी की नाक पर बैठे हैं, जिसका शरीर इतना बड़ा है कि हम उसे पूरा देख तक नहीं सकते। इसकी छाया इतनी विस्तृत है कि हम उसका अनुमान नहीं लगा सकते। इसकी आवाज़ इतनी ऊँची है कि हमारे कान इसे सुन नहीं सकते, और वह सर्वव्यापी है।"

जब तीसरी चीटीं ने यह बात कही तो दूसरी चीटियाँ एक-दूसरे को देख हँसने लगीं।
उसी समय वह व्यक्ति नींद में हिला। चींटियाँ लड़खड़ाई और गिरने के डर से उन्होंने अपने नन्हें पंजे उसकी नाक के मांस में गढ़ा दिए जिससे सोते हुए उस आदमी ने नींद में ही अपने हाथ से अपनी नाक खुजलायी और तीनों चींटियाँ पिसकर रह गईं।
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उल्लू और कौवा : Panchtantra ki kahani






एक जंगल में पक्षियों के राजा गरूड़ रहते थे। एक दिन पक्षियों ने सभा बुलाई। अपने नेता के बारे में चर्चा करने लगे। एक तोता बोला, गरूड़ को अपना राजा बनाने का क्या लाभ? वह तो सदा भगवान वासुदेव की भक्ति में लगा रहता है.. मुश्किल में हमारी मदद कैसे करेगा?

उसकी बात से सभी पक्षी सहमत हो गए और उन्होंने नया राजा चुनने का विचार किया। सर्वसम्मति से उल्लू को राजा चुना गया।

अभिषेक की तैयारियाँ होने लगी। ज्यों ही उल्लूकराज राजसिंहासन पर बैठने वाले थे त्यों ही कहीं से एक कौआ आकर बोला, तुम सब क्यों यहाँ इकट्ठे हो? यह कैसा समारोह है?

कौए को देखकर सभी आश्चर्य में पड़ गए। उसे तो किसी ने बुलाया ही नहीं था। पर कौआ सबसे चतुर कूटराजनीतिज्ञ पक्षी है, ऐसा उन्हें पता था इसलिए सभी कौए के चारों ओर इकट्ठे होकर मंत्रणा करने लगे।

उलूकराज के राज्याभिषेक की बात सुनकर कौए ने हंसते हुए कहा, मूर्ख पक्षियों! इतने सारे सुंदर पक्षियों के होते हुए दिवांध और टेढ़ी नाक वाले बदसूरत उल्लू को तुम सब ने राजा बनाने का कैसे विचार किया? वह स्वभाव से ही रौद्र और कटुभाषी है। एक राजा के होते हुए दूसरे को राजा बनाना विनाश को निमंत्रण देना है।

किसी दूसरे दिन, किसी दूसरे पक्षी को अपने नेता के रूप में चुना जाएगा ऐसा निर्णय कर सभी पक्षी अपने घर चले गए। दिन का समय था। उल्लू अकेला रह गया क्योंकि दिन में उसे दिखता ही नहीं है। एक दूसरे उल्लू ने धीरे से उल्लू के कान में फुसफुसाकर कहा, महाराज, कौए ने आपके राज्याभिषेक में विघ्न डाला है, सभी पक्षी घर चले गए हैं।

चिढ़े हुए उल्लू ने कौए से कहा, क्यों रे दुष्ट! तुम्हारे कारण मैं राजा न बन सका। आज से तेरा मेरा वंशपरंपरागत बैर रहेगा।

इस प्रकार कौए और उल्लू में हमेशा के लिए दुश्मनी हो गई!

उल्लू और सभी पक्षियों के जाने के पश्चात् कौए ने मन में विचारा कि व्यर्थ में मैंने उल्लू को अपना बैरी बना लिया।

यही सोचता हुए कौआ भी अपने घर चला गया। पर तभी से कौवों और उल्लुओं में स्वाभाविक बैर चला आ रहा है।

... अतः कोई भी बात बोलने से पहले मन में विचार अवश्य कर लेना चाहिए!!
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नकारात्मक आदमी : Motivation in hindi






किसी समय की बात है, एक शिकारी ने चिड़ियों को पकड़ने वाला एक अद्भुत कुत्ता खरीदा। उस कुत्ते की ख़ास बात यह थी कि वह पानी पर भी चल सकता था।

शिकारी वह कुत्ता अपने दोस्तों को दिखाना चाहता था। उसे इस बात की बड़ी खुशी थी कि वह अपने दोस्तों को यह काबिले-गौर चीज दिखा पाएगा।

उसने अपने एक दोस्त को चिड़िया का शिकार देखने के लिए बुलाया। कुछ देर में उन्होंने कई चिड़ियाओं को बंदूक से मार गिराया। उसके बाद उस आदमी ने कुत्ते को उन चिड़ियाओं को लाने का हुक्म दिया।

कुत्ता चिडियों को लाने के लिए दौड़ पड़ा। उस आदमी को उम्मीद थी कि उसका दोस्त कुत्ते के बारे में कुछ कहेगा, या उसकी तारीफ करेगा.. लेकिन उसका दोस्त कुछ नहीं बोला।

घर लौटते समय उसने अपने दोस्त से पूछा कि क्या उसने कुत्ते में कोई खास बात देखी।

दोस्त ने जवाब दिया.. हाँ, मैंने उसमें एक खास बात देखी... तुम्हारा कुत्ता तैर नहीं सकता!!
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आप क्या बनना चाहते हो?: Motivation in hindi






एक दिन एक छोटी सी लड़की अपने पिता को अपना दुखः व्यक्त करते-करते अपने जीवन को कोसते हुए यह बता रही थी कि उसका जीवन बहुत ही मुश्किल दौर से गुज़र रहा है। साथ ही उसके जीवन में एक दुख: का समय जाता है तो दूसरा चला आता है और वह इन मुश्किलों से लड़-लड़ कर अब थक चुकी है। वह करे.. तो क्या करे?

उसके पिता पेशे से एक शेफ़ थे। उन्होंने अपनी बेटी की इस बात को सुनने के बाद उसे अपनी बेटी को रसोईघर लेकर गये। और 3 कढ़ाईयों में पानी डाल कर तेज आग पर रख दिया। जैसे ही पानी गरम हो कर उबलने लगे, पिता नें एक कढ़ाई में एक आलू डाला, दुसरी में एक अंडा और तीसरी में कुछ कॉफ़ी के बीन्स डाल दिए।

वह लड़की बिना कोई प्रश्न किये अपने पिता के इस काम को ध्यान से देख रही थी!

कुछ 15-20 मिनट के बाद उन्होंने आग बंद कर दी और एक कटोरे में आलू को रखा, दुसरे में अंडे को और कॉफ़ी बीन्स वाले पानी को एक कप में.. अब पिता ने बेटी की तरफ उन तीनों कटोरों को दिखाते हुए एक साथ कहा... आलू, अंडे, और कॉफ़ी बीन्स!

पिता ने दुबारा बताते हुए बेटी से कहा! पास से देखो इन तीनों चीजों को –

बेटी ने आलू को देखा, जो उबलने के कारण मुलायम हो गया था। उसके बाद अंडे को देखा, जो उबलने के बाद अन्दर से कठोर हो गया था। और अंत में जब कॉफ़ी बीन्स को देखा तो उस पानी से बहुत ही अच्छी खुशबु आ रही थी ।

पिता ने बेटी से पुछा! क्या तुम्हें पता चला इसका मतलब क्या है?

फिर पिता ने उसे समझाते हुए कहा.. इन तीनो चीजों ने अलग-अलग तरीके से गर्म पानी के साथ प्रतिक्रिया की परन्तु जो मुश्किल उन्होंने झेली वह एक समान थी

फिर उन्होंने अपनी बेटी से प्रश्न किया - जब विपरीत परिस्थितियों में तुम्हारे जीवन में आती हैं, तो तुम क्या बनना चाहोगी... आलू, अंडा या कॉफ़ी बीन्स..?!!
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चींटी, चिड़िया और मकड़ी का जाला!






कहीं किसी जगह पर एक मकड़ी रहती थी। उसने आराम से रहने के लिए एक शानदार जाला बनाने का विचार किया और सोचा की इस जाले मे खूब कीड़ें, मक्खियाँ फसेंगी और मै उन्हें खूब मज़े से खाऊँगी और मजे से रहूंगी। उसने कमरे के एक कोने को पसंद किया और वहाँ जाला बुनना शुरू किया।
कुछ देर बाद आधा जाला बुन कर तैयार हो गया। यह देखकर वह मकड़ी काफी खुश हुई कि तभी अचानक उसकी नजर एक बिल्ली पर पड़ी जो उसे देखकर हँस रही थी।

मकड़ी को गुस्सा आ गया और वह बिल्ली से बोली, "हँस क्यो रही हो?”

“हँसू नही तो क्या करूँ?!” , बिल्ली ने जवाब दिया, "यहाँ मक्खियाँ नही है ये जगह तो बिलकुल साफ सुथरी है, यहाँ कौन आयेगा तेरे जाले मे?”

ये बात मकड़ी के गले उतर गई। उसने अच्छी सलाह के लिये बिल्ली को धन्यवाद दिया और जाला अधूरा छोड़कर दूसरी जगह तलाश करने लगी।
उसने ईधर ऊधर देखा। उसे एक खिड़की नजर आयी और फिर उसमे जाला बुनना शुरू किया कुछ देर तक वह जाला बुनती रही, तभी एक चिड़िया आयी और मकड़ी का मजाक उड़ाते हुए बोली, "अरे मकड़ी, तू भी कितनी बेवकूफ है।”

“क्यो?” मकड़ी ने पूछा!

चिड़िया उसे समझाने लगी, "अरे यहां तो खिड़की से तेज हवा आती है। यहा तो तू अपने जाले के साथ ही उड़ जायेगी।”

मकड़ी को चिड़िया की बात ठीक लगी और वह वहाँ भी जाला अधूरा बना छोड़कर सोचने लगी अब कहाँ जाला बनायाँ जाये। समय काफी बीत चूका था और अब उसे भूख भी लगने लगी थी। अब उसे एक अलमारी का खुला दरवाजा दिखा और उसने उसी मे अपना जाला बुनना शुरू किया। कुछ जाला बुना ही था तभी उसे एक काकरोच नजर आया जो जाले को अचरज भरे नजरो से देख रहा था।

मकड़ी ने पूछा – ‘इस तरह क्यो देख रहे हो?’

काकरोच बोला- अरे यहाँ कहाँ जाला बुनने चली आयी ये तो बेकार की आलमारी है। अभी ये यहाँ पड़ी है कुछ दिनों बाद इसे बेच दिया जायेगा और तुम्हारी सारी मेहनत बेकार चली जायेगी। यह सुन कर मकड़ी ने वहां से हट जाना ही बेहतर समझा।

बार-बार प्रयास करने से वह काफी थक चुकी थी और उसके अंदर जाला बुनने की ताकत ही नही बची थी। भूख की वजह से वह परेशान थी। उसे पछतावा हो रहा था कि अगर पहले ही जाला बुन लेती तो अच्छा रहता। पर अब वह कुछ नहीं कर सकती थी उसी हालत मे पड़ी रही।

जब मकड़ी को लगा कि अब कुछ नहीं हो सकता है तो उसने पास से गुजर रही चींटी से मदद करने का आग्रह किया।

चींटी बोली, "मैं बहुत देर से तुम्हे देख रही थी, तुम बार- बार अपना काम शुरू करती और दूसरों के कहने पर उसे अधूरा छोड़ देती.. और जो लोग ऐसा करते हैं, उनकी हालत ऐसी ही होती है।”
.......और ऐसा कहते हुए वह अपने रास्ते चली गई और मकड़ी पछताती हुई निढाल पड़ी रही।
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सुंदर युवती और दो भिक्षुक

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शाम के वक्त दो बौद्ध भिक्षुक आश्रम को लौट रहे थे! अभी-अभी बारिश हुई थी और सड़क पर जगह जगह पानी लगा हुआ था! चलते चलते उन्होंने देखा की एक खूबसूरत नवयुवती सड़क पार करने की कोशिश कर रही है पर पानी अधिक होने की वजह से ऐसा नहीं कर पा रही है! दोनों में से बड़ा बौद्ध भिक्षुक युवती के पास गया और उसे उठा कर सड़क की दूसरी और ले आया! इसके बाद वह अपने साथी के साथ आश्रम को चल दिया!

शाम को छोटा बौद्ध भिक्षुक बड़े वाले के पास पहुंचा और बोला, “ भाई, भिक्षुक होने के नाते हम किसी औरत को नहीं छू सकते?”

“हाँ”, बड़े ने उत्तर दिया!

तब छोटे ने पुनः पूछा, “ लेकिन आपने तो उस नवयुवती को अपनी गोद में उठाया था?”

यह सुन बड़ा बौद्ध भिक्षुक मुस्कुराते हुए बोला, “ मैंने तो उसे सड़क की दूसरी और छोड़ दिया था, पर तुम अभी भी उसे उठाये हुए हो!
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एक सीधा-सादा इंसान! घोर पारिवारिक! घुमक्कड़! चाय प्रेमी! सिनेमाई नशेड़ी! माइक्रो-फिक्शन लेखक!

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