संजय साेलंकी का ब्लाग

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तीन चीटियाँ : Khalil Jibran






एक व्यक्ति धूप में गहरी नींद में सो रहा था। तीन चीटियाँ उसकी नाक पर आकर इकट्ठी हुईं। तीनों ने अपनी प्रथा अनुसार एक दूसरे का अभिवादन किया और फिर वार्तालाप करने लगीं।

पहली चीटीं ने कहा, "मैंने इन पहाड़ों और घाटियों से अधिक बंजर जगह और कोई नहीं देखी। मैं यहाँ सारा दिन अन्न ढ़ूँढ़ती रही, किन्तु मुझे एक दाना तक नहीं मिला।"

दूसरी चीटीं ने कहा, "मुझे भी कुछ नहीं मिला, यद्यपि मैंने यहाँ का चप्पा-चप्पा छान मारा। मुझे लगता है कि यही वह कोमल और अस्थिर जगह है, जिसके बारे में हमारे लोग कहते हैं कि यहाँ कुछ पैदा नहीं होता।"

तब तीसरी चीटीं ने अपना सिर उठाया और कहा, "मेरी सहेलियो! इस समय हम सबसे बड़ी चींटी की नाक पर बैठे हैं, जिसका शरीर इतना बड़ा है कि हम उसे पूरा देख तक नहीं सकते। इसकी छाया इतनी विस्तृत है कि हम उसका अनुमान नहीं लगा सकते। इसकी आवाज़ इतनी ऊँची है कि हमारे कान इसे सुन नहीं सकते, और वह सर्वव्यापी है।"

जब तीसरी चीटीं ने यह बात कही तो दूसरी चीटियाँ एक-दूसरे को देख हँसने लगीं।
उसी समय वह व्यक्ति नींद में हिला। चींटियाँ लड़खड़ाई और गिरने के डर से उन्होंने अपने नन्हें पंजे उसकी नाक के मांस में गढ़ा दिए जिससे सोते हुए उस आदमी ने नींद में ही अपने हाथ से अपनी नाक खुजलायी और तीनों चींटियाँ पिसकर रह गईं।
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लोमड़ी और परछाई






सूर्योदय के समय अपनी परछाईं देखकर लोमड़ी ने कहा, “आज लंच में मैं ऊंट को खाऊंगी।”
सुबह का सारा समय उसने ऊंट की तलाश में गुजार दिया।
फिर दोपहर को अपनी परछाईं देखकर उसने कहा, “एक चूहा ही काफी होगा!”

: ख़लील जिब्रान
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कोरा कागज़






बर्फ-से सफेद कागज़ ने कहा, "मैं बेदाग़ पैदा हुआ और जिन्दगीभर बेदाग़ ही रहूँगा। स्याही मेरे नजदीक आए या कोई धब्बा मुझपर लगे, उससे पहले मैं जल जाना और सफेद राख में तब्दील हो जाना पसन्द करूँगा।"

स्याही से भरी दवात ने कागज की बात सुनी। मन-ही-मन वह अपने कालेपन पर हँसी। उसके बाद उसने कागज़ के नज़दीक जाने की कभी जरूरत नहीं समझी ।

बहुरंगी पेंसिलों ने भी कागज़ की बात सुनी। वे भी कभी उसके नज़दीक नहीं गईं।

और बर्फ-सा सफेद कागज़ जिन्दगीभर बेदाग़ और पावन ही बना रहा - शुद्ध, पवित्र और कोरा।

: ख़लील जिब्रान
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