संजय साेलंकी का ब्लाग

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भूगोल : Guleri ki kahani






एक शिक्षक को अपने इंस्पेक्टर के दौरे का भय हुआ और वह क्लास को भूगोल रटाने लगा। कहने लगा कि पृथ्वी गोल है।

यदि इंस्पेक्टर पूछे कि पृथ्वी का आकार कैसा है और तुम्हें याद न हो तो मैं सुंघनी की डिबिया दिखाऊंगा, उसे देखकर उत्तर देना।

गुरु जी की डिबिया गोल थी!

इंस्पेक्टर ने आकर वही प्रश्न एक विद्यार्थी से किया और उसने बड़ी उत्कंठा से की ओर देखा।

गुरु ने जेब में से चौकोर डिबिया निकाली.. लेकिन भूल से दूसरी डिबिया आ गई थी।

लड़का बोला, "बुधवार को पृथ्वी चौकौर होती है... और बाकी सब दिन गोल।"
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Ismat chugtai : मैं एक बच्चे को प्यार कर रही थी..






वालिद काफ़ी रौशनख़याल थे। बहुत-से हिंदू खानदानों से मेलजोल था, यानी एक ख़ास तबके के हिंदू-मुसलमान निहायत सलीके से घुले-मिले रहते थे। एक-दूसरे के जज़्बात का ख़याल रखते। हम काफ़ी छोटे थे, जब ही एहसास होने लगा था कि हिंदू-मुसलमान एक दूसरे से कुछ न कुछ मुख्तलिफ़ ज़रूर हैं। ज़बानी भाईचारे के प्रचार के साथ-साथ एक तरह की एहतियात का एहसास होता था।

अगर कोई हिंदू आए तो गोश्त-वोश्त का नाम न लिया जाए, साथ बैठकर मेज़ पर खाते वक्त भी ख्याल रखा जाए कि उनकी कोई चीज़ न छू जाए। सारा खाना दूसरे नौकर लगायें, उनका खाना पड़ोस का महाराज लगाये। बर्तन भी वहीं से माँगा दिए जायें। अजब घुटन सी तारी हो जाती थी.. बेहद ऊंची-ऊंची रौशनख़याली की बातें हो रही हैं। एक दूसरे की मुहब्बत और जाँनिसारी के किस्से दुहराए जा रहे हैं। अंग्रेजों को मुजरिम ठहराया जा रहा है। साथ-साथ सब बुजुर्ग लरज़ रहे हैं कि कहीं बच्चे छूटे बैल हैं, कोई ऐसी हरकत न कर बैठें कि धरम भ्रष्ट हो जाए।

''क्या हिंदू आ रहे हैं?'' पाबंदियां लगते देखकर हमलोग बोर होकर पूछते।
''ख़बरदार! चाचाजी और चाचीजी आ रहे हैं। बद्तमीज़ी की तो खाल खींचकर भूसा भर दिया जाएगा।''

और हम फ़ौरन समझ जाते कि चचाजान और चचिजान नहीं आ रहे हैं। जब वो आते हैं तो सीख़कबाब और मुर्ग़-मुसल्लम पकता है, लौकी का रायता और दही-बड़े नहीं बनते.. ये पकने और बनने का फर्क भी बड़ा दिलचस्प है।

हमारे पड़ोस में एक लालाजी रहते थे। उनकी बेटी से मेरी दांत-काटी रोटी थी। एक उम्र तक बच्चों पर छूत की पाबंदी लाज़मी नहीं समझी जाती। सूशी हमारे यहाँ खाना भी खा लेती थी। फल, दालमोट, बिस्कुट में इतनी छूत नहीं होती, लेकिन चूँकि हमें मालूम था कि सूशी गोश्त नहीं खाती, इसलिए उसे धोखे से किसी तरह गोश्त खिलाके बड़ा इत्मीनान होता था। हालाँकि उसे पता नहीं चलता था, मगर हमारा न जाने कौन सा जज़्बा तसल्ली पा जाता था।

वैसे दिन भर एक दूसरे के घर में घुसे रहते थे मगर बकरीद के दिन सूशी ताले में बंद कर दी जाती थी। बकरे अहाते के पीछे टट्टी खड़ी करके काटे जाते। कई दिन तक गोश्त बंटता रहता। उन दिनों हमारे घर से लालाजी से नाता टूट जाता। उनके यहाँ भी जब कोई त्योहार होता तो हम पर पहरा बिठा दिया जाता।

लालाजी के यहाँ बड़ी धूमधाम से जश्न मनाया जा रहा था। जन्माष्टमी थी। एक तरफ़ कड़ाह चढ़ रहे थे और धड़ाधड़ पकवान तले जा रहे थे। बहार हम फ़कीरों की तरह खड़े हसरत से तक रहे थे। मिठाइयों की होशरुबा खुशबू अपनी तरफ खीच रही थी। सूशी ऐसे मौकों पर बड़ी मज़हबी बन जाया करती थी। वैसे तो हम दोनों बारहा एक ही अमरूद बारी-बारी दांत से काटकर खा चुके थे, मगर सबसे छुपकर।

''भागो यहाँ से,'' आते-जाते लोग हमें दुत्कार जाते। हम फिर खिसक आते। फूले पेट की पूरियां तलते देखने का किस बच्चे को शौक़ नहीं होता है।

''अदंर क्या है?'' मैंने शोखी से पूछा। सामने का कमरा फूल-पत्तों से दुल्हन की तरह सजा हुआ था। अदंर से घंटियाँ बजने की आवाजें आ रही थीं। जी में खुदबुद हो रही थी- हाय अल्लाह, अदंर कौन है?

''वहां भगवान बिराजे हैं।'' सूशी ने गुरूर से गर्दन अकड़ाई।

''भगवान!'' मुझे बेइंतिहा एहसासे-कमतरी सताने लगा। उनके भगवान क्या मज़े से आते हैं। एक हमारे अल्ला मियां हैं, न जाने कौन सी रग फडकी की फ़कीरों की सफ़ से खिसक के मैं बरामदे में पहुँच गई। घर के किसी फर्द की नज़र न पड़ी। मेरे मुंह पर मेरा मज़हब तो लिखा नहीं था। उधर से एक देवीजी आरती की थाली लिए सबके माथे पर चंदन-चावल चिपकाती आईं। मेरे माथे पर भी लगाती गुज़र गईं। मैंने फ़ौरन हथेली से टीका छुटाना चाहा, फिर मेरी बद्जाती आडे आ गई। सुनते थे, जहाँ टीका लगे उतना गोश्त जहन्नुम में जाता है। खैर मेरे पास गोश्त की फरावानी थी, इतना सा गोश्त चला गया जहन्नुम में तो कौन टोटा आ जायेगा। नौकरों की सोहबत में बड़ी होशियारियों आ जाती हैं। माथे पर सर्टिफिकेट लिए, मैं मज़े से उस कमरे में घुस गई जहाँ भगवान बिराज रहे थे।

बचपन की आँखें कैसे सुहाने ख्वाबों का जाल बुन लेती हैं। घी और लोबान की खुशबू से कमरा महक रहा था। बीच कमरे में एक चाँदी का पलना लटक रहा था। रेशम और गोटे के तकियों और गद्दों पर एक रुपहली बच्चा लेटा झूल रहा था। क्या नफीस और बारीक काम था। बाल-बाल खूबसूरती से तराशा गया था। गले में माला, सर पर मोरपंखी मुकुट।

और सूरत इस गज़ब की भोली! आँखें जैसे लहकते हुए दिए! जिद कर रहा है, मुझे गोदी में ले लो। हौले से मैंने बच्चे का नरम-नरम गाल छुआ। मेरा रोआं-रोआं मुस्करा दिया। मैंने बे-इख्तियार उसे उठा कर सीने से लगा लिया।

एकदम जैसे तूफ़ान फट पड़ा और बच्चा चीख मारकर मेरी गोद से उछलकर गिर पड़ा। सूशी की नानी का मुंह फटा हुआ था। हाजियानी कैफियत तारी थी जैसे मैंने रुपहले बच्चे को चूमकर उसके हलक में तीर पैवस्त कर दिया हो।

चाचीजी ने झपटकर मेरा हाथ पकडा, भागती हुई लाईं और दरवाज़े से बाहर मुझे मरी हुई छिपकली की तरह फेंक दिया। फ़ौरन मेरे घर शिकायत पहुंची कि मैं चाँदी के भगवान की मूर्ति चुरा रही थी। अम्मा ने सर पीट लिया और फिर मुझे भी पीटा। वह तो कहो, अपने लालाजी से ऐसे भाईचारे वाले मरासिम थे: इससे भी मामूली हादिसों पर आजकल आये दिन खूनखराबे होते रहते हैं। मुझे समझाया गया कि बुतपरस्ती गुनाह है। महमूद गज़नवी बुतशिकन था। मेरी ख़ाक समझ में न आया। मेरे दिल में उस वक़्त परस्तिश का अहसास भी पैदा न हुआ था।

मैं... मैं पूजा नहीं कर रही थी, एक बच्चे को प्यार कर रही थी..!!!
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बाबा का भोग : Premchand ki kahani (in hindi)






रामधन अहीर के द्वार एक साधू आकर बोला- बच्चा तेरा कल्याण हो, कुछ साधू पर श्रद्धा कर! रामधन ने जाकर स्त्री से कहा- साधू द्वार पर आए हैं, उन्हें कुछ दे दे..

स्त्री बरतन माँज रही थी और इस घोर चिंता में मग्न थी कि आज भोजन क्या बनेगा, घर में अनाज का एक दाना भी न था।
चैत का महीना था, किन्तु यहाँ दोपहर ही को अंधकार छा गया था। उपज सारी की सारी खलिहान से उठ गई। आधी महाजन ने ले ली, आधी जमींदार के प्यादों ने वसूल ली, भूसा बेचा तो व्यापारी से गला छूटा, बस थोड़ी-सी गाँठ अपने हिस्से में आई। उसी को पीट-पीटकर एक मन भर दाना निकला था।

किसी तरह चैत का महीना पार हुआ। अब आगे क्या होगा? क्या बैल खाएँगे? क्या घर के प्राणी खाएँगे? यह ईश्वर ही जाने!
पर द्वार पर साधू आ गया है, उसे निराश कैसे लौटाएँ, अपने दिल में क्या कहेगा।

स्त्री ने कहा- क्या दे दूँ, कुछ तो रहा नहीं।

रामधन- जा, देख तो मटके में, कुछ आटा-वाटा मिल जाए तो ले आ।

स्त्री ने कहा- मटके झाड़ पोंछकर तो कल ही चूल्हा जला था, क्या उसमें बरकत होगी?

रामधन- तो मुझसे तो यह न कहा जाएगा कि बाबा घर में कुछ नहीं है किसी और के घर से माँग ला।

स्त्री - जिससे लिया उसे देने की नौबत नहीं आई, अब और किस मुँह से माँगू?

रामधन- देवताओं के लिए कुछ अगोवा निकाला है न वही ला, दे आऊँ।

स्त्री- देवताओं की पूजा कहाँ से होगी?

रामधन- देवता माँगने तो नहीं आते? समाई होगी करना, न समाई हो न करना।

स्त्री- अरे तो कुछ अँगोवा भी पँसरी दो पँसरी है? बहुत होगा तो आध सेर। इसके बाद क्या फिर कोई साधू न आएगा। उसे तो जवाब देना ही पड़ेगा।

रामधन- यह बला तो टलेगी फिर देखी जाएगी।

स्त्री झुँझला कर उठी और एक छोटी-सी हाँडी उठा लाई, जिसमें मुश्किल से आध सेर आटा था। वह गेहूँ का आटा बड़े यत्न से देवताओं के लिए रखा हुआ था। रामधन कुछ देर खड़ा सोचता रहा, तब आटा एक कटोरे में रखकर बाहर आया और साधू की झोली में डाल दिया।

महात्मा ने आटा लेकर कहा- बच्चा, अब तो साधू आज यहीं रमेंगे। कुछ थोड़ी-सी दाल दे तो साधू का भोग लग जाए।

रामधन ने फिर आकर स्त्री से कहा...
संयोग से दाल घर में थी। रामधन ने दाल, नमक, उपले जुटा दिए। फिर कुएँ से पानी खींच लाया।

साधू ने बड़ी विधि से बाटियाँ बनाईं, दाल पकाई और आलू झोली में से निकालकर भुरता बनाया।

जब सब सामग्री तैयार हो गई तो रामधन से बोले बच्चा, भगवान के भोग के लिए कौड़ी भर घी चाहिए। रसोई पवित्र न होगी तो भोग कैसे लगेगा?

रामधन- बाबाजी घी तो घर में न होगा।

साधू- बच्चा भगवान का दिया तेरे पास बहुत है। ऐसी बातें न कह।

रामधन- महाराज, मेरे गाय-भैंस कुछ भी नहीं है।

'जाकर मालकिन से कहो तो?'

रामधन ने जाकर स्त्री से कहा- घी माँगते हैं, माँगने को भीख, पर घी बिना कौर नहीं धंसता।

स्त्री- तो इसी दाल में से थोड़ी लेकर बनिए के यहाँ से ला दो। जब सब किया है तो इतने के लिए उन्हें नाराज करते हो।

घी आ गया। साधूजी ने ठाकुरजी की पिंडी निकाली, घंटी बजाई और भोग लगाने बैठे। खूब तनकर खाया, फिर पेट पर हाथ फेरते हुए द्वार पर लेट गए। थाली, बटली और कलछुली रामधन घर में माँजने के लिए उठा ले गया।

........ उस दिन रामधन के घर चूल्हा नहीं जला... खाली दाल पकाकर ही पी ली।
रामधन लेटा, तो सोच रहा था- मुझसे तो यही अच्छे!
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श्रेष्ठ उपासना






एक अत्याचारी बादशाह ने किसी साधु से पूछा कि मेरे लिए कौन-सी उपासना श्रेष्ठ है?

.....उत्‍तर मिला कि तुम्हारे लिए दोपहर तक सोना सब उपासनाओं से श्रेष्ठ है, जिससे उतनी देर तुम किसी को सता न सको।

- शेख़ सादी
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भेड़ और भेड़िया






कभी हमारे घर को भी पवित्र करो। करूणा से भीगे स्वर में भेड़िये ने भोली-भाली भेड़ से कहा।

'मैं जरूर आती, बशर्ते तुम्हारे घर का मतलब तुम्हारा पेट न होता।' भेड़ ने नम्रतापूर्वक जवाब दिया।
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बंद दरवाजा : Premchand ki kahani






सूरज क्षितिज की गोद से निकला, बच्चा पालने से। वही स्निग्धता, वही लाली, वही खुमार, वही रोशनी..

मैं बरामदे में बैठा था। बच्चे ने दरवाजे से झांका। मैंने मुस्कुराकर पुकारा। वह मेरी गोद में आकर बैठ गया।
उसकी शरारतें शुरू हो गईं। कभी कलम पर हाथ बढ़ाया, कभी कागज पर। मैंने गोद से उतार दिया। वह मेज का पाया पकड़े खड़ा रहा। घर में न गया। दरवाजा खुला हुआ था..

एक चिड़िया फुदकती हुई आई और सामने के सहन में बैठ गई। बच्चे के लिए मनोरंजन का यह नया सामान था। वह उसकी तरफ लपका। चिड़िया जरा भी न डरी। बच्चे ने समझा अब यह परदार खिलौना हाथ आ गया। बैठकर दोनों हाथों से चिड़िया को बुलाने लगा। चिड़िया उड़ गई, निराश बच्चा रोने लगा। मगर अंदर के दरवाजे की तरफ ताका भी नहीं। दरवाजा खुला हुआ था...

गरम हलवे की मीठी पुकार आई। बच्चे का चेहरा चाव से खिल उठा। खोंचेवाला सामने से गुजरा। बच्चे ने मेरी तरफ याचना की आँखों से देखा। ज्यों-ज्यों खोंचेवाला दूर होता गया, याचना की आँखें रोष में परिवर्तित होती गईं। यहाँ तक कि जब मोड़ आ गया और खोंचेवाला आँख से ओझल हो गया तो रोष ने पुरजोर फरियाद की सूरत अख्तियार की। मगर मैं बाजार की चीजें बच्चों को नहीं खाने देता। बच्चे की फरियाद ने मुझ पर कोई असर न किया। मैं आगे की बात सोचकर और भी तन गया। कह नहीं सकता बच्चे ने अपनी माँ की अदालत में अपील करने की जरूरत समझी या नहीं। आमतौर पर बच्चे ऐसे हालातों में माँ से अपील करते हैं। शायद उसने कुछ देर के लिए अपील मुल्तवी कर दी हो। उसने दरवाजे की तरफ रुख न किया। दरवाजा खुला हुआ था....

मैंने आँसू पोंछने के ख्याल से अपना फाउंटेनपेन उसके हाथ में रख दिया। बच्चे को जैसे सारे जमाने की दौलत मिल गई। उसकी सारी इंद्रियाँ इस नई समस्या को हल करने में लग गईं।

......एकाएक दरवाजा हवा से खुद-ब-खुद बंद हो गया। पट की आवाज बच्चे के कानों में आई। उसने दरवाजे की तरफ देखा। उसकी वह व्यस्तता तत्क्षण लुप्त हो गई। उसने फाउंटेनपेन को फेंक दिया और रोता हुआ दरवाजे की तरफ चला क्योंकि दरवाजा बंद हो गया था..!!
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राजा और बंदर : Panchtantra ki kahani






किसी समय की बात है, किसी राज्य में एक राजा अपने पालतू बंदर के साथ रहता था। वह राजा का विश्वासपात्र और भक्त था। राजमहल में कहीं भी बेरोकटोक आ जा सकता था। मंत्रियों को यह जरा भी अच्छा नहीं लगता था।

एक बार उन्होंने राजा से जाकर कहा- बन्दर को इतनी छूट देकर आप अपना ही बुरा कर रहे हैं। एक बंदर कभी भी चतुर और स्वामीभक्त सेवक नहीं बन सकता है। कहीं यह आपके लिए खतरा न बन जाए।

मंत्रियों की सलाह राजा को पसंद नहीं आई, बल्कि वह उन पर नाराज हो गया। कुछ दिनों के बाद भोजन के बाद राजा अंतःपुर में विश्राम करने गया। पीछे-पीछे बंदर भी गया। बिस्तर पर लेटकर राजा ने बंदर से कहा कि वह सोने जा रहा है। कोई उसे सोते समय परेशान न करे।

राजा सो गया और बंदर पंखा झलने लगा। अचानक एक मक्खी आ गई और इधर-उधर उड़ने लगी।

पंखे से बंदर उसे बार-बार हटाता पर वह बार-बार आकर राजा की छाती पर बैठ जाती। काफी देर बाद बंदर को गुस्सा आ गया और उसने मक्खी को मजा चखाने की सोची...

फिर से जब मक्खी राजा के ऊपर बैठी तो उसने कटार हाथ में ले लिया और खींचकर निशाना लगाकर मक्खी को दे मारा मारा। मक्खी तो झट से उड़ गई पर कटार सीधे राजा के सीने में घुस गई!

बंदर की इस बेवकूफ़ी से राजा की मौत हो गई और बंदर आश्चर्यचकित सा यह सब समझने की चेष्टा करता रहा....

.....अतः मूर्ख की संगत से दूर ही रहना चाहिए!!
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नकारात्मक आदमी : Motivation in hindi






किसी समय की बात है, एक शिकारी ने चिड़ियों को पकड़ने वाला एक अद्भुत कुत्ता खरीदा। उस कुत्ते की ख़ास बात यह थी कि वह पानी पर भी चल सकता था।

शिकारी वह कुत्ता अपने दोस्तों को दिखाना चाहता था। उसे इस बात की बड़ी खुशी थी कि वह अपने दोस्तों को यह काबिले-गौर चीज दिखा पाएगा।

उसने अपने एक दोस्त को चिड़िया का शिकार देखने के लिए बुलाया। कुछ देर में उन्होंने कई चिड़ियाओं को बंदूक से मार गिराया। उसके बाद उस आदमी ने कुत्ते को उन चिड़ियाओं को लाने का हुक्म दिया।

कुत्ता चिडियों को लाने के लिए दौड़ पड़ा। उस आदमी को उम्मीद थी कि उसका दोस्त कुत्ते के बारे में कुछ कहेगा, या उसकी तारीफ करेगा.. लेकिन उसका दोस्त कुछ नहीं बोला।

घर लौटते समय उसने अपने दोस्त से पूछा कि क्या उसने कुत्ते में कोई खास बात देखी।

दोस्त ने जवाब दिया.. हाँ, मैंने उसमें एक खास बात देखी... तुम्हारा कुत्ता तैर नहीं सकता!!
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कोरा कागज़






बर्फ-से सफेद कागज़ ने कहा, "मैं बेदाग़ पैदा हुआ और जिन्दगीभर बेदाग़ ही रहूँगा। स्याही मेरे नजदीक आए या कोई धब्बा मुझपर लगे, उससे पहले मैं जल जाना और सफेद राख में तब्दील हो जाना पसन्द करूँगा।"

स्याही से भरी दवात ने कागज की बात सुनी। मन-ही-मन वह अपने कालेपन पर हँसी। उसके बाद उसने कागज़ के नज़दीक जाने की कभी जरूरत नहीं समझी ।

बहुरंगी पेंसिलों ने भी कागज़ की बात सुनी। वे भी कभी उसके नज़दीक नहीं गईं।

और बर्फ-सा सफेद कागज़ जिन्दगीभर बेदाग़ और पावन ही बना रहा - शुद्ध, पवित्र और कोरा।

: ख़लील जिब्रान
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तेनाली राम की कहानी : tenali ram ki kahani

Tenali-Rama.jpg




एक दिन बातों-बातों में राजा कृष्णदेव राय ने तेनालीराम से पूछा, ‘अच्छा, यह बताओ कि किस प्रकार के लोग सबसे अधिक मूर्ख होते हैं और किस प्रकार के सबसे अधिक सयाने?’

तेनालीराम ने तुरंत उत्तर दिया, ‘महाराज! ब्राह्मण सबसे अधिक मूर्ख और व्यापारी सबसे अधिक सयाने होते हैं।’
‘ऐसा कैसे हो सकता है?’ राजा ने कहा।
‘मैं यह बात साबित कर सकता हूं’, तेनालीराम ने कहा।

‘कैसे?’ राजा ने पूछा।’

‘अभी जान जाएंगे आप, जरा राजगुरु को बुलवाइए।’

राजगुरु को बुलवाया गया।

तेनालीराम ने कहा, ‘महाराज, अब मैं अपनी बात साबित करूंगा, लेकिन इस काम में आप दखल नहीं देंगे। आप यह वचन दें, तभी मैं काम आरंभ करूंगा।’

राजा ने तेनालीराम की बात मान ली। तेनालीराम ने आदरपूर्वक राजगुरु से कहा, ‘राजगुरुजी, महाराज को आपकी चोटी की आवश्यकता है। इसके बदले आपको मुंहमांगा इनाम दिया जाएगा।’

राजगुरु को काटो तो खून नहीं। वर्षों से पाली गई प्यारी चोटी को कैसे कटवा दें? लेकिन राजा की आज्ञा कैसे टाली जा सकती थी।

उसने कहा, ‘तेनालीरामजी, मैं इसे कैसे दे सकता हूं।’

‘राजगुरुजी, आपने जीवनभर महाराज का नमक खाया है। चोटी कोई ऐसी वस्तु तो है नहीं, जो फिर न आ सके। फिर महाराज मुंहमांगा इनाम भी दे रहे हैं…।’

राजगुरु मन ही मन समझ गया कि यह तेनालीराम की चाल है।

तेनालीराम ने पूछा, ‘राजगुरुजी, आपको चोटी के बदले क्या इनाम चाहिए?’

राजगुरु ने कहा, ‘पांच स्वर्ण मुद्राएं बहुत होंगी।’

पांच स्वर्ण मुद्राएं राजगुरु को दे दी गईं और नाई को बुलावाकर राजगुरु की चोटी कटवा दी गई।

अब तेनालीराम ने नगर के सबसे प्रसिद्ध व्यापारी को बुलवाया। तेनालीराम ने व्यापारी से कहा, ‘महाराज को तुम्हारी चोटी की आवश्यकता है।

‘सब कुछ महाराज का ही तो है, जब चाहें ले लें, लेकिन बस इतना ध्यान रखें कि मैं एक गरीब आदमी हूं’, व्यापारी ने कहा।

‘तुम्हें तुम्हारी चोटी का मुंहमांगा दाम दिया जाएगा’, तेनालीराम ने कहा।

‘सब आपकी कृपा है लेकिन…’, व्यापारी ने कहा।

‘क्या कहना चाहते हो तुम’, तेनालीराम ने पूछा।

‘जी बात यह है कि जब मैंने अपनी बेटी का विवाह किया था, तो अपनी चोटी की लाज रखने के लिए पूरी पांच हजार स्वर्ण मुद्राएं खर्च की थीं। पिछले साल मेरे पिता की मौत हुई, तब भी इसी कारण पांच हजार स्वर्ण मुद्राओं का खर्च हुआ और अपनी इसी प्यारी-दुलारी चोटी के कारण बाजार से कम से कम पांच हजार स्वर्ण मुद्राओं का उधार मिल जाता है’, अपनी चोटी पर हाथ फेरते हुए व्यापारी ने कहा।

‘इस तरह तुम्हारी चोटी का मूल्य पंद्रह हजार स्वर्ण मुद्राएं हुआ। ठीक है, यह मूल्य तुम्हें दे दिया जाएगा।’

पंद्रह हजार स्वर्ण मुद्राएं व्यापारी को दे दी गईं। व्यापारी चोटी मुंड़वाने बैठा। जैसे ही नाई ने चोटी पर उस्तरा रखा, व्यापारी कड़ककर बोला, ‘संभलकर, नाई के बच्चे। जानता नहीं, यह महाराज कृष्णदेव राय की चोटी है।’

राजा ने सुना तो आग-बबूला हो गया। इस व्यापारी की यह मजाल कि हमारा अपमान करे?

उन्होंने कहा, ‘धक्के मारकर निकाल दो इस सिरफिरे को।’ व्यापारी पंद्रह हजार स्वर्ण मुद्राओं की थैली को लेकर वहां से भाग निकला।

कुछ देर बाद तेनालीराम ने कहा, ‘आपने देखा महाराज, राजगुरु ने तो पांच स्वर्ण मुद्राएं लेकर अपनी चोटी मुंड़वा ली। व्यापारी पंद्रह हजार स्वर्ण मुद्राएं भी ले गया और चोटी भी बचा ली। आप ही कहिए, ब्राह्मण सयाना हुआ कि व्यापारी?’
राजा ने कहा, ‘सचमुच तुम्हारी बात ठीक निकली।’
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राजकुमार और नौकरानी की बेटी






किसी राज्य में बहुत पहले एक राजकुमार था जो जल्द ही राजा बनने वाला था। राज्य की परंपरा के अनुसार राजा बनने से पहले उसे विवाह करना आवश्यक था।

दरबार के एक बुद्धिमान व्यक्ति ने उसे सलाह दी कि वह राज्य की सभी विवाह योग्य युवतियों को बुलाकर उनमें से अपने लिए सुयोग्य वधु का चुनाव करे।

राजकुमार के महल में एक स्त्री काम करती थी जिसकी पुत्री भी विवाह योग्य थी। जब उसने राजकुमार के विवाह के लिए की जा रही तैयारियां होते देखा तो उसका दिल डूबने लगा क्योंकि उसकी पुत्री राजकुमार से बहुत प्रेम करती थी।

उसने घर पहुंचकर राजकुमार के विवाह की खबर अपनी पुत्री को दी। वह यह जानकर अचंभित हो गई कि उसकी पुत्री भी स्वयंवर में जाना चाहती थी।

उसने अपनी पुत्री से कहा, “बिटिया, तुम वहां जाकर क्या करोगी? वहां तो पूरे देश से सुंदर और धनी लड़कियां राजकुमार का वरण करने के लिए आएंगी। राजकुमार से विवाह की इच्छा अपने मन से निकाल दो। मैं जानती हूं कि तुम्हें इससे दुख होगा लेकिन अपने दुख को खुद पर हावी करके अपने जीवन को व्यर्थ न होने दो!”

पुत्री ने कहा, “मां, तुम चिंतित न हो। मैं दुखी नहीं हूं और मेरा निर्णय सही है। मुझे पता है कि राजकुमार मुझे नहीं चुनेगा लेकिन इसी बहाने मुझे कुछ समय के लिए उसके निकट होने का मौका मिलेगा। मेरे लिए यही बहुत है। मैं जानती हूं कि मेरी किस्मत में महलों का प्रेम नहीं लिखा है।”

स्वयंवर की रात को सभी नवयुवतियां महल पहुंचीं। वहां सुंदर-से-सुंदर और धनी युवतियों का जमघट था जो सुंदर वस्त्रों और बहुमूल्य आभूषणों से स्वयं को सुसज्जित करके राजकुमार की नजरों में आने के किसी भी मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहती थी।

राजकुमार ने तब भरे दरबार में सभी युवतियों से कहा, “मैं तुममें से प्रत्येक को एक बीज दूंगा। इस बीज से पौधा निकलने के छः महीने बाद जो युवती मुझे सबसे सुंदर फूल लाकर देगी मैं उसी से विवाह करुंगा और वही इस राज्य की रानी बनेगी।”

सभी युवतियों को गमले में एक-एक बीज रोपकर दे दिया गया। महल की नौकरानी की पुत्री को बागवानी या पौधे की देखभाल के बारे में कुछ पता नहीं था फिर भी उसने बहुत धैर्य और लगन से गमले की देखभाल की। राजकुमार के प्रति उसके दिल में गहरा प्रेम था और वह आश्वस्त थी कि पौधे से निकलनेवाला फूल बहुत सुंदर होगा।

तीन महीने बीत गए लेकिन गमले में कोई पौधा नहीं उगा। नौकरानी की पुत्री ने सब कुछ करके देख लिया। उसने मालियों और किसानों से बात की, जिन्होंने उसे बागवानी की कुछ तरकीबें सुझाईं, लेकिन किसी ने काम नहीं किया। उसके गमले में कुछ नहीं उगा, और इसी सब में छः महीने बीत गए।

अपने खाली गमले को लेकर वह राजमहल पहुंची। उसने देखा कि बाकी युवतियों के गमलों में बहुत अच्छे पौधे उगे थे और हर पौधे में एक अद्वितीय फूल खिला था। हर फूल एक-से-बढ़कर-एक था।

अंत में वह घड़ी आ गई जिसकी सभी बाट जोह रहे थे। राजकुमार दरबार में आया और उसने सभी युवतियों के गमलों और फूल को बहुत गौर से देखा।

फिर राजकुमार ने परिणाम की घोषणा की। उसने नौकरानी की पुत्री की ओर इशारा करके कहा कि वह उससे विवाह करेगा।

वहां उपस्थित सभी जन रोष व्यक्त करने लगे। उन्होंने कहा कि राजकुमार ने सुंदर फूल लेकर आई युवतियों की उपेक्षा करके उस युवती को चुना जो खाली गमला लेकर चली आई थी।

राजकुमार ने शांतिपूर्वक सभी को संबोधित कर कहा, “केवल यही युवती रानी बनने की योग्यता रखती है क्योंकि उसने सच्चाई और ईमानदारी का फूल खिलाया है। जो बीज मैंने छः महीने पहले सभी युवतियों को दिए थे वे निर्जीव थे। उनसे पौधा उगकर फूल खिलना असंभव था।”




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शेर और हाथी की कहानी

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एक शेर जंगल में किसी संकरी जगह से गुज़र रहा था. उसने सामने से एक हाथी को अपनी ओर आते देखा तो गरज कर कहा, “मेरे रास्ते से हट जाओ”!

“मैं? मैं हट जाऊं?”, हाथी ने जवाब दिया, “मैं तुमसे बहुत बड़ा हूं और कायदे से मुझे यहां से पहले निकलना चाहिए. मेरी बजाए तुम्हारे लिए किनारे लगना ज्यादा आसान है”.

“लेकिन मैं इस जंगल का राजा हूं और तुम्हें अपने राजा को आता देख उसके लिए रास्ता छोड़ देना चाहिए”, शेर ने गुस्से से कहा, “मैं तुम्हें रास्ते से हटने का हुक्म देता हूं”!

यह सुनकर हाथी ने अपनी सूंड से शेर को उठा लिया और उसे जमीन पर कई बार पटका. फिर उसने शेर को एक पेड़ के तने पर दे मारा और उसे सर के बल गिरा दिया!

शेर किनारे पर पड़ा कराहता रहा और हाथी उसके बगल से अपने रास्ते चला गया. शेर जैसे-तैसे कुछ ताकत सहेजकर खड़ा और चिल्लाकर बोला, “इसमें इतना नाराज़ होने की कौन सी बात थी”!!
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एक सीधा-सादा इंसान! घोर पारिवारिक! घुमक्कड़! चाय प्रेमी! सिनेमाई नशेड़ी! माइक्रो-फिक्शन लेखक!

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