संजय साेलंकी का ब्लाग

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मछलियों की खुशी

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एक दिन च्वांग-त्जु और उनका दोस्त एक तालाब के किनारे बैठे हुए थे।

च्वांग-त्जु ने अपने दोस्त से कहा – उन मछलियों को तैरते हुए देखो! वे कितनी खुश हैं।

तुम खुद तो मछली नहीं हो – उनके दोस्त ने कहा... फ़िर तुम यह कैसे जानते हो कि वे खुश हैं?

तुम भी तो मैं नहीं हो.. च्वांग-त्जु ने कहा... फ़िर तुम यह कैसे जानते हो कि मैं यह नहीं जानता कि मछलियाँ खुश हैं?!
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साधू और नवयुवती

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शाम के वक्त दो बौद्ध भिक्षुक आश्रम को लौट रहे थे! अभी-अभी बारिश हुई थी और सड़क पर जगह जगह पानी लगा हुआ था!

चलते चलते उन्होंने देखा की एक खूबसूरत नवयुवती सड़क पार करने की कोशिश कर रही है पर पानी अधिक होने की वजह से ऐसा नहीं कर पा रही है!

दोनों में से बड़ा बौद्ध भिक्षुक युवती के पास गया और उसे उठा कर सड़क की दूसरी और ले आया! इसके बाद वह अपने साथी के साथ आश्रम को चल दिया!

शाम को छोटा बौद्ध भिक्षुक बड़े वाले के पास पहुंचा और बोला, “ भाई, भिक्षुक होने के नाते हम किसी औरत को नहीं छू सकते?”

“हाँ”, बड़े ने उत्तर दिया!

तब छोटे ने पुनः पूछा, “ लेकिन आपने तो उस नवयुवती को अपनी गोद में उठाया था?”

यह सुन बड़ा बौद्ध भिक्षुक मुस्कुराते हुए बोला, “ मैंने तो उसे सड़क की दूसरी और छोड़ दिया था, पर तुम अभी भी उसे उठाये हुए हो!
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साधुओं का फैसला






एक औरत अपने घर से निकली, उसने घर के सामने तीन साधुओं को बैठे देखा..
लेकिन वह उन्हें पहचान नही पायी।

उसने कहा, मैं आप लोगों को नहीं पहचानती, बताइए क्या काम है?

हमें भोजन करना है! साधुओं ने कहा।

ठीक है ! कृपया मेरे घर में पधारिये और भोजन ग्रहण कीजिये।

क्या तुम्हारा पति घर में है? एक साधु ने प्रश्न किया।

नहीं, वह कुछ देर के लिए बाहर गए हैं। औरत ने उत्तर दिया।

तब हम अन्दर नहीं आ सकते, तीनो एक साथ बोले।

थोड़ी देर में पति घर वापस आ गया, उसे साधुओं के बारे में पता चला तो उसने तुरंत अपनी पत्नी से उन्हें पुन: आमंत्रित करने के लिए कहा। औरत ने ऐसा ही किया, वह साधुओं के समक्ष गयी और बोली.. जी, अब मेरे पति वापस आ गए हैं, कृपया आप लोग घर में प्रवेश करिए!

हम किसी घर में एक साथ प्रवेश नहीं करते। साधुओं ने स्त्री को बताया।

ऐसा क्यों है? औरत ने अचरज से पूछा।

जवाब में मध्य में खड़े साधु ने बोला, पुत्री मेरी दायीं तरफ खड़े साधू का नाम ‘धन’ और बायीं तरफ खड़े साधू का नाम ‘सफलता’ है, और मेरा नाम ‘प्रेम’ है।
अब जाओ और अपने पति से विचार-विमर्श कर के बताओ की तुम हम तीनो में से किसे बुलाना चाहती हो।

औरत अन्दर गयी और अपने पति से सारी बात बता दी। पति बेहद खुश हो गया। वाह, आनंद आ गया, चलो जल्दी से ‘धन’ को बुला लेते हैं, उसके आने से हमारा घर धन-दौलत से भर जाएगा, और फिर कभी पैसो की कमी नहीं होगी।
औरत बोली, क्यों न हम सफलता को बुला लें, उसके आने से हम जो करेंगे वो सही होगा, और हम देखते-देखते धन-दौलत के मालिक भी बन जायेंगे।

हम्म, तुम्हारी बात भी सही है, पर इसमें मेहनत करनी पड़ेगी, मुझे तो लगता ही धन को ही बुला लेते हैं.. पति बोला!

थोड़ी देर उनकी बहस चलती रही पर वो किसी निश्चय पर नहीं पहुँच पाए, और अंतत: निश्चय किया कि वह साधुओं से यह कहेंगे कि धन और सफलता में जो आना चाहे आ जाये।

औरत झट से बाहर गयी और उसने यह आग्रह साधुओं के सामने दोहरा दिया।

उसकी बात सुनकर साधुओं ने एक दूसरे की तरफ देखा और बिना कुछ कहे घर से दूर जाने लगे।

अरे! आप लोग इस तरह वापस क्यों जा रहे हैं? औरत ने उन्हें रोकते हुए पूछा।

"पुत्री, दरअसल हम तीनो साधू इसी तरह द्वार-द्वार जाते हैं, और हर घर में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं, जो व्यक्ति लालच में आकर धन या सफलता को बुलाता है हम वहां से लौट जाते हैं, और जो अपने घर में प्रेम का वास चाहता है उसके यहाँ बारी- बारी से हम दोनों भी प्रवेश कर जाते हैं। इसलिए इतना याद रखना कि जहाँ प्रेम है वहां धन और सफलता की कमी नहीं होती!”
...........ऐसा कहते हुए धन और सफलता नामक साधुओं ने अपनी बात पूर्ण की!
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शिष्य और साइकिल






एक ज़ेन गुरु ने देखा कि उसके पाँच शिष्य बाज़ार से अपनी-अपनी साइकिलों पर लौट रहे हैं। जब वे साइकिलों से उतर गए तब गुरु ने उनसे पूछा – “तुम सब साइकिलें क्यों चलाते हो?”

पहले शिष्य ने उत्तर दिया – “मेरी साइकिल पर आलुओं का बोरा बंधा है। इससे मुझे उसे अपनी पीठ पर नहीं ढोना पड़ता”।

गुरु ने उससे कहा – “तुम बहुत होशियार हो। जब तुम बूढे हो जाओगे तो तुम्हें मेरी तरह झुक कर नहीं चलना पड़ेगा”।

दूसरे शिष्य ने उत्तर दिया – “मुझे साइकिल चलाते समय पेड़ों और खेतों को देखना अच्छा लगता है”।

गुरु ने उससे कहा – “तुम हमेशा अपनी आँखें खुली रखते हो और दुनिया को देखते हो”।

तीसरे शिष्य ने कहा – “जब मैं साइकिल चलाता हूँ तब मंत्रों का जप करता रहता हूँ”।

गुरु ने उसकी प्रशंसा की – “तुम्हारा मन किसी नए कसे हुए पहिये की तरह रमा रहेगा”।

चौथे शिष्य ने उत्तर दिया – “साइकिल चलाने पर मैं सभी जीवों से एकात्मकता अनुभव करता हूँ”।

गुरु ने प्रसन्न होकर कहा – “तुम अहिंसा के स्वर्णिम पथ पर अग्रसर हो”।

पाँचवे शिष्य ने उत्तर दिया – “मैं साइकिल चलाने के लिए साइकिल चलाता हूँ”।

गुरु उठकर पाँचवे शिष्य के चरणों के पास बैठ गए और बोले – “मैं आपका शिष्य हूँ”।
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चाय के प्याले






जापानी ज़ेन गुरु सुजुकी रोशी के एक शिष्य ने उनसे एक दिन पूछा – “जापानी लोग चाय के प्याले इतने पतले और कमज़ोर क्यों बनाते हैं कि वे आसानी से टूट जाते हैं?”

सुजुकी रोशी ने उत्तर दिया – “चाय के प्याले कमज़ोर नहीं होते बल्कि तुम्हें उन्हें भली-भांति सहेजना नहीं आता। स्वयं को अपने परिवेश में ढालना सीखो, परिवेश को अपने लिए बदलने का प्रयास मत करो।”
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भविष्य देखने वाला

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किसी राज्य में कहीं एक बहुत प्रसिद्ध भविष्यवेत्ता रहता था. एक दिन वह राह चलते कुएं में गिर गया. हुआ यूं कि वह रात के दौरान तारों का अवलोकन करते हुए चला जा रहा था. उसे पता न था कि राह में कहीं एक कुंआ है, उसी कुंए में वो गिर गया.

उसके गिरने और चिल्लाने की आवाज़ सुनकर पास ही एक झोपड़ी में रहनेवाली बुढ़िया उसकी मदद को वहां पहुंच गई और उसे कुंए से निकाला.

जान बची पाकर भविष्यवेत्ता बहुत खुश हुआ. वह बोला, “तुम नहीं आतीं तो मैं मारा जाता! तुम्हें पता है मैं कौन हूं? मैं राज-ज्योतिषी हूं. हर कोई आदमी मेरी फीस नहीं दे सकता – यहां तक कि राजाओं को भी मेरा परामर्श लेने के लिए महीनों तक इंतज़ार करना पड़ता है – लेकिन मैं तुमसे कोई पैसा नहीं लूंगा. तुम कल मेरे घर आओ, मैं मुफ्त में तुम्हारा भविष्य बताऊंगा”.

यह सुनकर बुढ़िया बहुत हंसी और बोली, “यह सब रहने दो! तुम्हें अपने दो कदम आगे का तो कुछ दिखता नहीं है, मेरा भविष्य तुम क्या ख़ाक बताओगे?”
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एक सीधा-सादा इंसान! घोर पारिवारिक! घुमक्कड़! चाय प्रेमी! सिनेमाई नशेड़ी! माइक्रो-फिक्शन लेखक!

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