संजय साेलंकी का ब्लाग

खुश रहने का तरीका : Way of happiness (Steve Wozniak)






आजकल लोगो के पास पहले से ज्यादा सुविधाएं हैं लेकिन बावजूूद इसके किसी के पास पल भर की खुशी नहीं है.. बल्कि हर एक आदमी खुशी की तलाश में है।

दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनी एप्पल के को-फाउंडर स्टीव वोज्नियाक ने अपने खुश करने का राज दुनिया को बताया है।

स्टीव वोज्नियाक का कहना है कि जिंदगी में खुश रहने के लिए पैसों से ज्यादा जिंदगी जीने का तरीका मायने रखता है।

जब वोज्नियाक से पूछा गया कि उनके हर वक्त मुस्कुराते रहने का क्या राज है?

इस पर उन्होंने कहा कि अगर उनके पास इतनी दौलत ना भी होती तो भी वे हंसते ही रहते।

...उन्होंने कहा कि उन्होंने बीस साल की उम्र में ही खुश रहने का तरीका खोज लिया था और ये तरीका है, परेशानियों को खुद पर हावी ना होने देना और हर वक्त खुश रहने के बहाने खोजना।

और जिंदगी में हमारी जवाबदेही सिर्फ एक आदमी के प्रति होनी चाहिए- खुद के प्रति।

वोज्नियाक ने आगे बताया, मैं जब बीस साल का था तभी समझ में आ गया था कि जिंदगी में असली खुशी कैसे मिलेगी। इसके लिए मैं काम को दफ्तर से बाहर लेकर नहीं जाने वाला तरीका अपनाया। आज तक अपने फोन में एप्पल का कोई ऐप डाउनलोड नहीं किया।

जब हमारी कार पर कोई स्क्रैच लग जाता है तो क्या हम जिंदगी भर उसका गम मनाते रहते हैं? नहीं। हम जल्द से जल्द अपनी कार को ठीक कराते हैं और थोड़ी सावधानी के साथ वापस इसकी सवारी का आनंद लेने लगते हैं।

जिंदगी भी इसी तरह चलती रहती है। मैं अगर अपने दोस्तों के साथ मजाक करूं, परिवार के साथ वक्त बिताऊं और आज मर जाऊं तो कोई मलाल नहीं रहेगा।

मैं ये नहीं चाहता कि दोस्तों के साथ बैठकर फोन पर एप्पल के शेयर खरीदता-बेचता रहूं या टेक्नोलॉजी के बारे में बातें करता रहूं।

...मैं आखिर में कहूंगा कि कभी किसी से बहस मत करिए! शायद आपके तर्क खत्म हो जाएं, लेकिन बहस कभी खत्म नहीं होती... और दूसरा हर बहस में एक पक्ष हमेशा हारता है!!
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भूगोल : Guleri ki kahani






एक शिक्षक को अपने इंस्पेक्टर के दौरे का भय हुआ और वह क्लास को भूगोल रटाने लगा। कहने लगा कि पृथ्वी गोल है।

यदि इंस्पेक्टर पूछे कि पृथ्वी का आकार कैसा है और तुम्हें याद न हो तो मैं सुंघनी की डिबिया दिखाऊंगा, उसे देखकर उत्तर देना।

गुरु जी की डिबिया गोल थी!

इंस्पेक्टर ने आकर वही प्रश्न एक विद्यार्थी से किया और उसने बड़ी उत्कंठा से की ओर देखा।

गुरु ने जेब में से चौकोर डिबिया निकाली.. लेकिन भूल से दूसरी डिबिया आ गई थी।

लड़का बोला, "बुधवार को पृथ्वी चौकौर होती है... और बाकी सब दिन गोल।"
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Ismat chugtai : मैं एक बच्चे को प्यार कर रही थी..






वालिद काफ़ी रौशनख़याल थे। बहुत-से हिंदू खानदानों से मेलजोल था, यानी एक ख़ास तबके के हिंदू-मुसलमान निहायत सलीके से घुले-मिले रहते थे। एक-दूसरे के जज़्बात का ख़याल रखते। हम काफ़ी छोटे थे, जब ही एहसास होने लगा था कि हिंदू-मुसलमान एक दूसरे से कुछ न कुछ मुख्तलिफ़ ज़रूर हैं। ज़बानी भाईचारे के प्रचार के साथ-साथ एक तरह की एहतियात का एहसास होता था।

अगर कोई हिंदू आए तो गोश्त-वोश्त का नाम न लिया जाए, साथ बैठकर मेज़ पर खाते वक्त भी ख्याल रखा जाए कि उनकी कोई चीज़ न छू जाए। सारा खाना दूसरे नौकर लगायें, उनका खाना पड़ोस का महाराज लगाये। बर्तन भी वहीं से माँगा दिए जायें। अजब घुटन सी तारी हो जाती थी.. बेहद ऊंची-ऊंची रौशनख़याली की बातें हो रही हैं। एक दूसरे की मुहब्बत और जाँनिसारी के किस्से दुहराए जा रहे हैं। अंग्रेजों को मुजरिम ठहराया जा रहा है। साथ-साथ सब बुजुर्ग लरज़ रहे हैं कि कहीं बच्चे छूटे बैल हैं, कोई ऐसी हरकत न कर बैठें कि धरम भ्रष्ट हो जाए।

''क्या हिंदू आ रहे हैं?'' पाबंदियां लगते देखकर हमलोग बोर होकर पूछते।
''ख़बरदार! चाचाजी और चाचीजी आ रहे हैं। बद्तमीज़ी की तो खाल खींचकर भूसा भर दिया जाएगा।''

और हम फ़ौरन समझ जाते कि चचाजान और चचिजान नहीं आ रहे हैं। जब वो आते हैं तो सीख़कबाब और मुर्ग़-मुसल्लम पकता है, लौकी का रायता और दही-बड़े नहीं बनते.. ये पकने और बनने का फर्क भी बड़ा दिलचस्प है।

हमारे पड़ोस में एक लालाजी रहते थे। उनकी बेटी से मेरी दांत-काटी रोटी थी। एक उम्र तक बच्चों पर छूत की पाबंदी लाज़मी नहीं समझी जाती। सूशी हमारे यहाँ खाना भी खा लेती थी। फल, दालमोट, बिस्कुट में इतनी छूत नहीं होती, लेकिन चूँकि हमें मालूम था कि सूशी गोश्त नहीं खाती, इसलिए उसे धोखे से किसी तरह गोश्त खिलाके बड़ा इत्मीनान होता था। हालाँकि उसे पता नहीं चलता था, मगर हमारा न जाने कौन सा जज़्बा तसल्ली पा जाता था।

वैसे दिन भर एक दूसरे के घर में घुसे रहते थे मगर बकरीद के दिन सूशी ताले में बंद कर दी जाती थी। बकरे अहाते के पीछे टट्टी खड़ी करके काटे जाते। कई दिन तक गोश्त बंटता रहता। उन दिनों हमारे घर से लालाजी से नाता टूट जाता। उनके यहाँ भी जब कोई त्योहार होता तो हम पर पहरा बिठा दिया जाता।

लालाजी के यहाँ बड़ी धूमधाम से जश्न मनाया जा रहा था। जन्माष्टमी थी। एक तरफ़ कड़ाह चढ़ रहे थे और धड़ाधड़ पकवान तले जा रहे थे। बहार हम फ़कीरों की तरह खड़े हसरत से तक रहे थे। मिठाइयों की होशरुबा खुशबू अपनी तरफ खीच रही थी। सूशी ऐसे मौकों पर बड़ी मज़हबी बन जाया करती थी। वैसे तो हम दोनों बारहा एक ही अमरूद बारी-बारी दांत से काटकर खा चुके थे, मगर सबसे छुपकर।

''भागो यहाँ से,'' आते-जाते लोग हमें दुत्कार जाते। हम फिर खिसक आते। फूले पेट की पूरियां तलते देखने का किस बच्चे को शौक़ नहीं होता है।

''अदंर क्या है?'' मैंने शोखी से पूछा। सामने का कमरा फूल-पत्तों से दुल्हन की तरह सजा हुआ था। अदंर से घंटियाँ बजने की आवाजें आ रही थीं। जी में खुदबुद हो रही थी- हाय अल्लाह, अदंर कौन है?

''वहां भगवान बिराजे हैं।'' सूशी ने गुरूर से गर्दन अकड़ाई।

''भगवान!'' मुझे बेइंतिहा एहसासे-कमतरी सताने लगा। उनके भगवान क्या मज़े से आते हैं। एक हमारे अल्ला मियां हैं, न जाने कौन सी रग फडकी की फ़कीरों की सफ़ से खिसक के मैं बरामदे में पहुँच गई। घर के किसी फर्द की नज़र न पड़ी। मेरे मुंह पर मेरा मज़हब तो लिखा नहीं था। उधर से एक देवीजी आरती की थाली लिए सबके माथे पर चंदन-चावल चिपकाती आईं। मेरे माथे पर भी लगाती गुज़र गईं। मैंने फ़ौरन हथेली से टीका छुटाना चाहा, फिर मेरी बद्जाती आडे आ गई। सुनते थे, जहाँ टीका लगे उतना गोश्त जहन्नुम में जाता है। खैर मेरे पास गोश्त की फरावानी थी, इतना सा गोश्त चला गया जहन्नुम में तो कौन टोटा आ जायेगा। नौकरों की सोहबत में बड़ी होशियारियों आ जाती हैं। माथे पर सर्टिफिकेट लिए, मैं मज़े से उस कमरे में घुस गई जहाँ भगवान बिराज रहे थे।

बचपन की आँखें कैसे सुहाने ख्वाबों का जाल बुन लेती हैं। घी और लोबान की खुशबू से कमरा महक रहा था। बीच कमरे में एक चाँदी का पलना लटक रहा था। रेशम और गोटे के तकियों और गद्दों पर एक रुपहली बच्चा लेटा झूल रहा था। क्या नफीस और बारीक काम था। बाल-बाल खूबसूरती से तराशा गया था। गले में माला, सर पर मोरपंखी मुकुट।

और सूरत इस गज़ब की भोली! आँखें जैसे लहकते हुए दिए! जिद कर रहा है, मुझे गोदी में ले लो। हौले से मैंने बच्चे का नरम-नरम गाल छुआ। मेरा रोआं-रोआं मुस्करा दिया। मैंने बे-इख्तियार उसे उठा कर सीने से लगा लिया।

एकदम जैसे तूफ़ान फट पड़ा और बच्चा चीख मारकर मेरी गोद से उछलकर गिर पड़ा। सूशी की नानी का मुंह फटा हुआ था। हाजियानी कैफियत तारी थी जैसे मैंने रुपहले बच्चे को चूमकर उसके हलक में तीर पैवस्त कर दिया हो।

चाचीजी ने झपटकर मेरा हाथ पकडा, भागती हुई लाईं और दरवाज़े से बाहर मुझे मरी हुई छिपकली की तरह फेंक दिया। फ़ौरन मेरे घर शिकायत पहुंची कि मैं चाँदी के भगवान की मूर्ति चुरा रही थी। अम्मा ने सर पीट लिया और फिर मुझे भी पीटा। वह तो कहो, अपने लालाजी से ऐसे भाईचारे वाले मरासिम थे: इससे भी मामूली हादिसों पर आजकल आये दिन खूनखराबे होते रहते हैं। मुझे समझाया गया कि बुतपरस्ती गुनाह है। महमूद गज़नवी बुतशिकन था। मेरी ख़ाक समझ में न आया। मेरे दिल में उस वक़्त परस्तिश का अहसास भी पैदा न हुआ था।

मैं... मैं पूजा नहीं कर रही थी, एक बच्चे को प्यार कर रही थी..!!!
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बाबा का भोग : Premchand ki kahani (in hindi)






रामधन अहीर के द्वार एक साधू आकर बोला- बच्चा तेरा कल्याण हो, कुछ साधू पर श्रद्धा कर! रामधन ने जाकर स्त्री से कहा- साधू द्वार पर आए हैं, उन्हें कुछ दे दे..

स्त्री बरतन माँज रही थी और इस घोर चिंता में मग्न थी कि आज भोजन क्या बनेगा, घर में अनाज का एक दाना भी न था।
चैत का महीना था, किन्तु यहाँ दोपहर ही को अंधकार छा गया था। उपज सारी की सारी खलिहान से उठ गई। आधी महाजन ने ले ली, आधी जमींदार के प्यादों ने वसूल ली, भूसा बेचा तो व्यापारी से गला छूटा, बस थोड़ी-सी गाँठ अपने हिस्से में आई। उसी को पीट-पीटकर एक मन भर दाना निकला था।

किसी तरह चैत का महीना पार हुआ। अब आगे क्या होगा? क्या बैल खाएँगे? क्या घर के प्राणी खाएँगे? यह ईश्वर ही जाने!
पर द्वार पर साधू आ गया है, उसे निराश कैसे लौटाएँ, अपने दिल में क्या कहेगा।

स्त्री ने कहा- क्या दे दूँ, कुछ तो रहा नहीं।

रामधन- जा, देख तो मटके में, कुछ आटा-वाटा मिल जाए तो ले आ।

स्त्री ने कहा- मटके झाड़ पोंछकर तो कल ही चूल्हा जला था, क्या उसमें बरकत होगी?

रामधन- तो मुझसे तो यह न कहा जाएगा कि बाबा घर में कुछ नहीं है किसी और के घर से माँग ला।

स्त्री - जिससे लिया उसे देने की नौबत नहीं आई, अब और किस मुँह से माँगू?

रामधन- देवताओं के लिए कुछ अगोवा निकाला है न वही ला, दे आऊँ।

स्त्री- देवताओं की पूजा कहाँ से होगी?

रामधन- देवता माँगने तो नहीं आते? समाई होगी करना, न समाई हो न करना।

स्त्री- अरे तो कुछ अँगोवा भी पँसरी दो पँसरी है? बहुत होगा तो आध सेर। इसके बाद क्या फिर कोई साधू न आएगा। उसे तो जवाब देना ही पड़ेगा।

रामधन- यह बला तो टलेगी फिर देखी जाएगी।

स्त्री झुँझला कर उठी और एक छोटी-सी हाँडी उठा लाई, जिसमें मुश्किल से आध सेर आटा था। वह गेहूँ का आटा बड़े यत्न से देवताओं के लिए रखा हुआ था। रामधन कुछ देर खड़ा सोचता रहा, तब आटा एक कटोरे में रखकर बाहर आया और साधू की झोली में डाल दिया।

महात्मा ने आटा लेकर कहा- बच्चा, अब तो साधू आज यहीं रमेंगे। कुछ थोड़ी-सी दाल दे तो साधू का भोग लग जाए।

रामधन ने फिर आकर स्त्री से कहा...
संयोग से दाल घर में थी। रामधन ने दाल, नमक, उपले जुटा दिए। फिर कुएँ से पानी खींच लाया।

साधू ने बड़ी विधि से बाटियाँ बनाईं, दाल पकाई और आलू झोली में से निकालकर भुरता बनाया।

जब सब सामग्री तैयार हो गई तो रामधन से बोले बच्चा, भगवान के भोग के लिए कौड़ी भर घी चाहिए। रसोई पवित्र न होगी तो भोग कैसे लगेगा?

रामधन- बाबाजी घी तो घर में न होगा।

साधू- बच्चा भगवान का दिया तेरे पास बहुत है। ऐसी बातें न कह।

रामधन- महाराज, मेरे गाय-भैंस कुछ भी नहीं है।

'जाकर मालकिन से कहो तो?'

रामधन ने जाकर स्त्री से कहा- घी माँगते हैं, माँगने को भीख, पर घी बिना कौर नहीं धंसता।

स्त्री- तो इसी दाल में से थोड़ी लेकर बनिए के यहाँ से ला दो। जब सब किया है तो इतने के लिए उन्हें नाराज करते हो।

घी आ गया। साधूजी ने ठाकुरजी की पिंडी निकाली, घंटी बजाई और भोग लगाने बैठे। खूब तनकर खाया, फिर पेट पर हाथ फेरते हुए द्वार पर लेट गए। थाली, बटली और कलछुली रामधन घर में माँजने के लिए उठा ले गया।

........ उस दिन रामधन के घर चूल्हा नहीं जला... खाली दाल पकाकर ही पी ली।
रामधन लेटा, तो सोच रहा था- मुझसे तो यही अच्छे!
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अक्षय तृतीया की कहानियाँ : Akshay tritiya in hindi






अक्षय तृतीया हिन्दू केलेण्डर के वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। शुक्ल पक्ष अर्थात अमावस्या के बाद के पंद्रह दिन जिनमें चंद्रमा बढ़ता है। अक्षय तृतीया शुक्ल पक्ष में ही आती है। इसे बोल-चाल की भाषा में अखाती तीज भी कहते हैं।

अक्षय तृतीया का अर्थ :

अक्षय का अर्थ होता है “जो कभी खत्म ना हो” और इसीलिए कहा जाता है कि अक्षय तृतीया वह तिथि है जिसमें सौभाग्य और शुभ फल का कभी क्षय नहीं होता। इस दिन होने वाले कार्य मनुष्य के जीवन को कभी न खत्म होने वाले शुभ फल प्रदान करते हैं।

अक्षय तृतिया का महत्व:

यह दिन सभी शुभ कार्य के लिए सर्वश्रेष्ठ है। अक्षय तृतीया के दिन विवाह होना अत्यंत ही शुभ माना जाता है। जिस प्रकार इस दिन पर दिये गए दान का पुण्य कभी खत्म नहीं होता उसी प्रकार इस दिन होने वाले विवाह में भी पति–पत्नी के बीच प्रेम कभी खत्म नहीं होता।

विवाह के अलावा सभी मांगलिक कार्य जैसे, उपनयन संस्कार, घर आदि का उद्घाटन, नया व्यापार डालना, नए प्रोजेक्ट शुरू करना भी शुभ माना जाता है। इस दिन सोना तथा गहने खरीदना भी शुभ होता हैं। इस दिन व्यापार आदि शुरू करने से मनुष्य को हमेशा तरक्की मिलती है तथा उसके भाग्य में दिनों दिन शुभ फल की बढ़ोत्तरी होती है।

अक्षय तृतिया की कहानियाँ :

अखाती तीज के पीछे कई कहानियाँ हैं। कुछ इसे भगवान विष्णु के जन्म से जोड़ती हैं, तो कुछ इसे भगवान कृष्ण की लीला से। सभी मान्यताएँ आस्था से जुड़ी होने के साथ साथ बहूत रोचक भी हैं...

1. यह दिन पृथ्वी के रक्षक श्री विष्णुजी को समर्पित है। हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार विष्णुजी ने श्री परशुराम के रूप में धरती पर अवतार लिया था। इस दिन परशुराम के रूप में विष्णुजी छटवी बार धरती पर अवतरित हुए थे और इसीलिए यह दिन परशुराम के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

2. त्रेता युग में धरती की सबसे पावन नदी गंगा इसी दिन स्वर्ग से धरती पर आई। गंगा नदी को भागीरथ धरती पर लाये थे। इस पवित्र नदी के धरती पर आने से इस दिन की पवित्रता और बढ़ जाती है और इसीलिए यह दिन हिंदुओं के पावन पर्व में शामिल है। इस दिन पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं।

3. यह दिन रसोई एवं भोजन की देवी माँ अन्नपूर्णा का जन्मदिन भी माना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन माँ अन्नपूर्णा का भी पूजन किया जाता है और माँ से भंडारे भरपूर रखने का वरदान मांगा जाता है। अन्नपूर्णा के पूजन से रसोई तथा भोजन में स्वाद बढ़ जाता है।

4. दक्षिण भारत में इस दिन कुबेर ने शिवपुरम नामक जगह पर शिव की आराधना कर उन्हें प्रसन्न किया था। कुबेर की तपस्या से प्रसन्न हो कर शिवजी ने कुबेर से वर मांगने को कहा, कुबेर ने अपना धन एवं संपत्ति लक्ष्मीजी से पुनः प्राप्त करने का वरदान मांगा। तभी शंकरजी ने कुबेर को लक्ष्मीजी का पूजन करने की सलाह दी।

इसीलिए तब से ले कर आज तक अक्षय तृतीया पर लक्ष्मीजी का पूजन किया जाता है। लक्ष्मी विष्णु पत्नी हैं इसीलिए लक्ष्मीजी के पूजन के पहले भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। दक्षिण में इस दिन लक्ष्मी यंत्रम की पूजा की जाती है, जिसमें विष्णु, लक्ष्मीजी के साथ–साथ कुबेर का भी चित्र रहता है।

5. अक्षय तृतीया के दिन ही महर्षि वेदव्यास ने महाभारत लिखना आरंभ की थी। इसी दिन महाभारत के युधिष्ठिर को अक्षय पात्र की प्राप्ति हुई थी। इस अक्षय पात्र की विशेषता थी, कि इसमें से कभी भोजन समाप्त नहीं होता था। इस पात्र के द्वारा युधिष्ठिर अपने राज्य के निर्धन एवं भूखे लोगों को भोजन दे कर उनकी सहायता करते थे।

6. महाभारत में अक्षय तृतीया के दिन दुशासन ने द्रौपदी का चीरहरण किया था। द्रौपदी को इस चीरहरण से बचाने के लिए श्री कृष्ण ने कभी न खत्म होने वाली साड़ी का दान किया था।

7. जब श्री कृष्ण ने धरती पर जन्म लिया, तब अक्षय तृतीया के दिन उनके निर्धन मित्र सुदामा, कृष्ण से मिलने पहुंचे। सुदामा के पास देने के लिए सिर्फ चार चावल के दाने थे, वही सुदामा ने उनके चरणों में अर्पित कर दिये, परंतु श्री कृष्ण सब कुछ समझ गए और उन्होने सुदामा की निर्धनता को दूर करते हुए उसकी झोपड़ी को महल में परिवर्तित कर दिया और उसे सब सुविधाओं से सम्पन्न बना दिया।

8. उड़ीसा राज्य में अक्षय तृतीया का दिन किसानों के लिए शुभ माना जाता है। इस दिन से ही यहाँ के किसान अपने खेत को जोतना शुरू करते हैं। इस दिन उड़ीसा के विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथपूरी से रथयात्रा भी निकाली जाती है।
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तीन चीटियाँ : Khalil Jibran






एक व्यक्ति धूप में गहरी नींद में सो रहा था। तीन चीटियाँ उसकी नाक पर आकर इकट्ठी हुईं। तीनों ने अपनी प्रथा अनुसार एक दूसरे का अभिवादन किया और फिर वार्तालाप करने लगीं।

पहली चीटीं ने कहा, "मैंने इन पहाड़ों और घाटियों से अधिक बंजर जगह और कोई नहीं देखी। मैं यहाँ सारा दिन अन्न ढ़ूँढ़ती रही, किन्तु मुझे एक दाना तक नहीं मिला।"

दूसरी चीटीं ने कहा, "मुझे भी कुछ नहीं मिला, यद्यपि मैंने यहाँ का चप्पा-चप्पा छान मारा। मुझे लगता है कि यही वह कोमल और अस्थिर जगह है, जिसके बारे में हमारे लोग कहते हैं कि यहाँ कुछ पैदा नहीं होता।"

तब तीसरी चीटीं ने अपना सिर उठाया और कहा, "मेरी सहेलियो! इस समय हम सबसे बड़ी चींटी की नाक पर बैठे हैं, जिसका शरीर इतना बड़ा है कि हम उसे पूरा देख तक नहीं सकते। इसकी छाया इतनी विस्तृत है कि हम उसका अनुमान नहीं लगा सकते। इसकी आवाज़ इतनी ऊँची है कि हमारे कान इसे सुन नहीं सकते, और वह सर्वव्यापी है।"

जब तीसरी चीटीं ने यह बात कही तो दूसरी चीटियाँ एक-दूसरे को देख हँसने लगीं।
उसी समय वह व्यक्ति नींद में हिला। चींटियाँ लड़खड़ाई और गिरने के डर से उन्होंने अपने नन्हें पंजे उसकी नाक के मांस में गढ़ा दिए जिससे सोते हुए उस आदमी ने नींद में ही अपने हाथ से अपनी नाक खुजलायी और तीनों चींटियाँ पिसकर रह गईं।
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श्रेष्ठ उपासना






एक अत्याचारी बादशाह ने किसी साधु से पूछा कि मेरे लिए कौन-सी उपासना श्रेष्ठ है?

.....उत्‍तर मिला कि तुम्हारे लिए दोपहर तक सोना सब उपासनाओं से श्रेष्ठ है, जिससे उतनी देर तुम किसी को सता न सको।

- शेख़ सादी
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एक सीधा-सादा इंसान! घोर पारिवारिक! घुमक्कड़! चाय प्रेमी! सिनेमाई नशेड़ी! माइक्रो-फिक्शन लेखक!

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