संजय साेलंकी का ब्लाग

सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर






एक नवयुवक ने अत्यंत मेहनत करके तीरंदाजी सीखी.. और उसके बाद बहुत सी तीरंदाजी प्रतियोगिताएँ भी जीत ली।

फिर उसने अपने आसपास के तीरंदाजों को हराया, और खुद को विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर मानने लगा।

अब वह जहाँ भी जाता लोगों को उससे मुकाबला करने की चुनौती देता, और उन्हें हरा कर उनका मज़ाक उड़ाता।

एक बार किसी ने उससे कहा कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर तो एक जेन गुरु है, जो दूर कहीं ऊंचे दुर्गम पहाड़ पर रहते है।

नवयुवक ने उन्हें चुनौती देने का फैसला किया, और कई दिनों की यात्रा ने बाद वह सुबह -सुबह पहाड़ों के बीच स्थित उनके मठ जा पहुंचा।

वहाँ पहुँचकर उसने शीघ्रता से कहा...

मास्टर मैं आपको तीरंदाजी मुकाबले के लिए चुनौती देता हूँ!

मास्टर मुस्कुराये और उन्होंने नवयुवक की चुनौती स्वीकार कर ली..!

मुक़ाबला शुरू हुआ।

नवयुवक ने अपने पहले प्रयास में ही दूर रखे लक्ष्य के ठीक बीचो -बीच निशाना लगा दिया।

और अगले निशाने में उसने लक्ष्य पर लगे अपने पहले तीर को ही भेद डाला।

अपनी योग्यता पर घमंड करते हुए नवयुवक बोला, कहिये मास्टर, क्या आप इससे बेहतर करके दिखा सकते हैं? यदि हाँ..तो कर के दिखाइए... और यदि नहीं, तो हार मान लीजिये!

मास्टर बोले.. पुत्र, मेरे पीछे आओ!

मास्टर चलते-चलते एक खतरनाक खाई के पास पहुँच गए।

नवयुवक यह सब देख कुछ घबराया और बोला, मास्टर, ये आप मुझे कहाँ लेकर जा रहे हैं?

मास्टर बोले, घबराओ मत पुत्र, हम लगभग पहुँच ही गए हैं... उस ऊंची खाई के आखिरी छोर पर एक पत्थर लटक रहा था।

मास्टर शीघ्रतापूर्वक उस पत्थर पर पहुंचे, कमान से तीर निकाला और दूर एक पेड़ के फल पर सटीक निशाना लगाया।

निशाना लगाने के बाद मास्टर बोले.. आओ पुत्र, अब तुम भी उसी पेड़ पर निशाना लगा कर अपनी दक्षता सिद्ध करो!

नवयुवक डरते -डरते आगे बढ़ा और बेहद कठिनाई के साथ उस लटकते पत्थर पर जो कभी भी गहरी खाई में गिर सकता था, उस पर चढ़ा...

....और किसी तरह कमान से तीर निकाल कर निशाना लगाया पर निशाना लक्ष्य के आस -पास भी नहीं लगा।

नवयुवक निराश हो गया और अपनी हार स्वीकार कर ली।

तब मास्टर बोले.. पुत्र, तुमने तीर -धनुष पर तो नियंत्रण हांसिल कर लिया है पर तुम्हारा उस मन पर अभी भी नियंत्रण नहीं है जो किसी भी परिस्थिति में लक्ष्य को भेदने के लिए आवश्यक है।

पुत्र, इस बात को हमेशा ध्यान में रखो कि जब तक मनुष्य के अंदर सीखने की जिज्ञासा है तब तक उसके ज्ञान में वृद्धि होती है लेकिन जब उसके अंदर सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार आ जाता है तभी से उसका पतन प्रारम्भ हो जाता है।

नवयुवक मास्टर की बात समझ चुका था, उसे एहसास हो गया कि उसका धनुर्विद्या का ज्ञान बस अनुकूल परिस्थितियों में कारगर है और उसे अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है; उसने मास्टर से क्षमा मांगी और सदा एक शिष्य की तरह सीखने और अपने ज्ञान पर घमंड ना करने की सौगंध ली।

कहते है, उस पहाड़ से वापिस आने के बाद... किसी ने उसे कभी, कभी भी धनुष-बाण को हाथ लगाते नहीं देखा...

और फिर वह दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहलाया..!!
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खोटा सिक्का : Counterfeit coin

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यह एक सूफी कथा है। किसी गाँव में एक बहुत सरल स्वभाव का आदमी रहता था। वह लोगों को छोटी-मोटी चीज़ें बेचता था।

उस गाँव के सभी निवासी यह समझते थे कि उसमें निर्णय करने, परखने और आंकने की क्षमता नहीं थी। इसीलिए बहुत से लोग उससे चीज़ें खरीदकर उसे खोटे सिक्के दे दिया करते थे। वह उन सिक्कों को ख़ुशी-ख़ुशी ले लेता था।

किसी ने उसे कभी भी यह कहते नहीं सुना कि ‘यह सही है और यह गलत है’। कभी-कभी तो उससे सामान लेनेवाले लोग उसे कह देते थे कि उन्होंने दाम चुका दिया है, और वह उनसे पलटकर कभी नहीं कहता था कि ‘नहीं, तुमने पैसे नहीं दिए हैं’। वह सिर्फ इतना ही कहता ‘ठीक है’, और उन्हें धन्यवाद देता।

दूसरे गाँवों से भी लोग आते और बिना कुछ दाम चुकाए उससे सामान ले जाते या उसे खोटे पैसे दे देते। वह किसी से कोई शिकायत नहीं करता।

समय गुज़रते वह आदमी बूढ़ा हो गया और एक दिन उसकी मौत की घड़ी भी आ गयी. कहते हैं कि मरते हुए ये उसके अंतिम शब्द थे: – “मेरे खुदा, मैंने हमेशा ही सब तरह के सिक्के लिए, खोटे सिक्के भी लिए।

मैं भी एक खोटा सिक्का ही हूँ, मुझे मत परखना. मैंने तुम्हारे लोगों का फैसला नहीं किया, तुम भी मेरा फैसला मत करना!”

.... ऐसे आदमी को खुदा कैसे परखता?!
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Motivational Frog : मोटिवेशनल मेंडक








बहुत समय पहले की बात है एक तालाब में बहुत सारे मेंढक रहते थे। तालाब के बीचों-बीच एक बहुत पुराना धातु का खम्भा भी लगा हुआ था जिसे उस सरोवर को बनवाने वाले राजा ने लगवाया था। खम्भा काफी ऊँचा था और उसकी सतह भी बिलकुल चिकनी थी।

एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया कि क्यों ना एक रेस करवाई जाए। रेस में भाग लेने वाली प्रतियोगीयों को खम्भे पर चढ़ना होगा, और जो सबसे पहले ऊपर पहुच जाएगा वही विजेता माना जाएगा।

रेस का दिन आ पंहुचा, चारो तरफ बहुत भीड़ थी.. आस -पास के इलाकों से भी कई मेंढक इस रेस में हिस्सा लेने पहुचे थे और माहौल में सरगर्मी थी। हर तरफ शोर ही शोर था।

रेस शुरू हुई …

…लेकिन खम्भे को देखकर भीड़ में एकत्र हुए किसी भी मेंढक को ये यकीन नहीं हुआकि कोई भी मेंढक ऊपर तक पहुंच पायेगा।

हर तरफ यही सुनाई देता …

...अरे ये बहुत कठिन है!

...वो कभी भी ये रेस पूरी नहीं कर पायंगे!

... सफलता का तो कोई सवाल ही नहीं। इतने चिकने खम्भे पर चढ़ा ही नहीं जा सकता!

और यही हो भी रहा था, जो भी कोई मेंढक कोशिश करता.. वो थोडा ऊपर जाकर नीचे गिर जाता।

कई मेंढक दो -तीन बार गिरने के बावजूद अपने प्रयास में लगे हुए थे…

पर भीड़ तो अभी भी चिल्लाये जा रही थी.. ये नहीं हो सकता.. नामुमकिन है ये तो.. और वो उत्साहित मेंढक भी ये सुन-सुनकर हताश हो गए और अपना प्रयास छोड़ दिया।

लेकिन उन्ही मेंढकों के बीच एक छोटा सा मेंढक था, जो बार -बार गिरने पर भी उसी जोश के साथ ऊपर चढ़ने में लगा हुआ था.. वो लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा, वो हर बार गिरता और हर बार चढ़ता...

.....और देखते ही देखते वह खम्भे के ऊपर चढ़ गया!

उसकी जीत पर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ, सभी मेंढक उसे घेर कर खड़े हो गए और उससे पूछने लगे, तुमने ये असंभव काम कैसे कर दिखाया.. भला तुम्हे अपना लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति कहाँ से मिली, ज़रा हमें भी तो बताओ कि तुम इस खम्भे पर कैसे चढ़े?


..उसने इशारे से कहा... वो बहरा है.. वो सुन नहीं सकता है!!
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ख़ुश रहने की आदत : How to be happy






आज इस जीवन की आपाधापी में वो एक चीज़ है जिसे हम भुलाते जा रहे है, वो है... खुश रहना! वैसे तो महान विचारक और दार्शनिक सब कह गए हैं कि खुश रहना एक आदत होती है... आदत!

खुश रहने वाले व्यक्ति जीवन की अनेक बातों में से खुशी का चुनाव करते हैं… मतलब कि लोगों के सामने खुश या दुःखी होने के विकल्प होते हैं और उसमें से कुछ लोग खुशी को चुनते हैं।

अब ये खुश लोग है कौन? ये आते कहाँ से है??

खुश लोग वो है जो अपने जीवन में कुछ सिद्धांतों का पालन करते है.. जो निम्नलिखित है!

1. खुश लोग अपने लिए लक्ष्य बनातें है। हमारें बनाए लक्ष्यों के पूरा होने का उतना महत्व नहीं होता जितना इस बात का कि लक्ष्यों पा लेने के बाद पर हमारी उपलब्धि हमें किस प्रकार का व्यक्ति बनाती है।

यदि हम थोड़ी सी सफलता में खुशी से हैं हवा में उड़ने लगते है तो वह वास्तविक खुशी नहीं है। खुश रहने वाले व्यक्ति जीवन में सफलता, समृद्धि और शांति के लिए सार्थक लक्ष्य बनाते हैं।

वे अच्छे परिणामों की कामना करते हैं और उनके लिए मंजिल तक पहुंचने से अधिक ज़रूरी यह बात होती है कि वे इस लंबी यात्रा में सीखते जाएं और अपने अनुभव को और गहरा करते जाएं।

2. खुश लोग अच्छे दोस्त बनाते है। खुश लोग जानते हैं कि उनके दोस्त उनके जीवन पर सकारात्म और नकारात्मक, दोनो प्रभाव डाल सकते हैं। खुश लोग बनते कोशिश बुरे लोगों से दूर ही रहते है, वे उन्हीं लोगों को दोस्त बनाते हैं जो अच्छे होते हैं और एक-दूसरे को सफल बनाने में सहायक होते है।

3. खुश लोग बदलाव को स्वीकार करते है।
उन्हें पता होता है कि सारी दुनिया उनसे नहीं चल रही, अतः वे दुनिया को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश करने के बजाए खुद को बदलते है।

4. खुश व्यक्ति संतुष्ट और आभारी होते हैं। वे हर नई चीज़ को पाने के लिए लालायित नहीं रहते। वे अपने पास की चीज़ को ही बेस्ट मानते है। वे जीवन से मिलनेवाली चीजों के लिए आभारी होते हैं और संतुष्ट होकर आगे बढ़ते रहते है।

5. पहला सुख निरोगी काया.. इसी उक्ति का पालन करते हुए खुश व्यक्ति अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते है।

खुश लोग स्वाद के लिए सेहत के लिए भोजन करते है, वे अपने शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखते हैं। इससे फोकस बना रहता है, अच्छी अनूभुतियां होती हैं और सफलता भी मिलती है।
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दो बिल्लियाँ और एक बंदर : Panchtantra ki kahaani






एक जंगल में दो बिल्लियाँ रहती थी। उनका आपस में बहुत प्यार था। यूँ भी खाने को जो मिलता वह आपस में बाँट कर खाती थी।

एक दिन वह भोजन की तलाश में एक गाँव में गयी। वहां एक घर में उन्हें एक रोटी का टुकड़ा मिला..

उन दोनों बिल्लियों ने इस रोटी के टुकड़े को आपस में बांटकर खाना चाहा और रोटी के टुकड़े को बांटते समय उनका आपस में झगड़ा हो गया।

एक बिल्ली को अपनी रोटी का टुकड़ा दूसरी बिल्ली के टुकड़े से छोटा लगा तो वो बिल्लियाँ आपस में झगड़ने लगी।

दोनों बिल्लियों का झगड़ा आपस में बड़ता ही या रहा था। उनमे से एक बिल्ली ने कहा के किसी तीसरे से न्याय कराते है।

इस तरह दूसरी बिल्ली भी मान गई वह दोनों बिल्लियाँ जंगल की तरफ चल पड़ी और रास्ते में उन्हें एक बंदर मिला।

बिल्लियों ने सोचा चलो इस बंदर से ही न्याय कराते हैं। उन्होंने सारी बात उस बंदर को बताई और बंदर से न्याय करने के लिए विनती की।

यह सुनकर बंदर एक तराजू लेकर आया और रोटी के दोनों टुकड़े एक-एक पलड़े में रख दिए इस तरह तोलते समय यो टुकड़ा भारी होता बंदर उसे आप खा लेता था।

इस तरह जब दूसरी तरफ का पलड़ा भारी पड़ता बंदर उस में से कुछ टुकड़े को खा जाता।

इस तरह दोनों बिल्लियाँ बंदर को देखती रही और उसके फैसले का इंतज़ार करती रही।

परन्तु जब बिल्लियों ने देखा के रोटी को टुकड़ा बहुत छोटा रह गया है तो दोनों बिल्लियाँ बंदर से बोली, हम इस रोटी के टुकड़े का अपने-आप आपस में बांट लेगी..

इस पर बंदर बोला मुझे भी अपनी मेहनत की मजदूरी मिलनी चाहिए, हमें भी रोटी के टुकड़े में से कुछ हिस्सा मिलना चाहिए..

.... इतना कहकर बंदर ने बाकी बचे रोटी के टुकड़ों को अपने में मुंह में डाला और खा गया और दोनों बिल्लियों को वहाँ से भगा दिया।

दोनों बिल्लियाँ अब पछता रही थी उन्हें अपनी गलती का एहसास हो रहा था।

.... लेकिन अब पछताए क्या होवे जब चिड़िया चुग गई खेत!

हमारी आपसी लड़ाई का फायदा अक्सर बाहर वाले उठा ले जाते हैं!!
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खुश रहने का तरीका : Way of happiness (Steve Wozniak)






आजकल लोगो के पास पहले से ज्यादा सुविधाएं हैं लेकिन बावजूूद इसके किसी के पास पल भर की खुशी नहीं है.. बल्कि हर एक आदमी खुशी की तलाश में है।

दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनी एप्पल के को-फाउंडर स्टीव वोज्नियाक ने अपने खुश करने का राज दुनिया को बताया है।

स्टीव वोज्नियाक का कहना है कि जिंदगी में खुश रहने के लिए पैसों से ज्यादा जिंदगी जीने का तरीका मायने रखता है।

जब वोज्नियाक से पूछा गया कि उनके हर वक्त मुस्कुराते रहने का क्या राज है?

इस पर उन्होंने कहा कि अगर उनके पास इतनी दौलत ना भी होती तो भी वे हंसते ही रहते।

...उन्होंने कहा कि उन्होंने बीस साल की उम्र में ही खुश रहने का तरीका खोज लिया था और ये तरीका है, परेशानियों को खुद पर हावी ना होने देना और हर वक्त खुश रहने के बहाने खोजना।

और जिंदगी में हमारी जवाबदेही सिर्फ एक आदमी के प्रति होनी चाहिए- खुद के प्रति।

वोज्नियाक ने आगे बताया, मैं जब बीस साल का था तभी समझ में आ गया था कि जिंदगी में असली खुशी कैसे मिलेगी। इसके लिए मैं काम को दफ्तर से बाहर लेकर नहीं जाने वाला तरीका अपनाया। आज तक अपने फोन में एप्पल का कोई ऐप डाउनलोड नहीं किया।

जब हमारी कार पर कोई स्क्रैच लग जाता है तो क्या हम जिंदगी भर उसका गम मनाते रहते हैं? नहीं। हम जल्द से जल्द अपनी कार को ठीक कराते हैं और थोड़ी सावधानी के साथ वापस इसकी सवारी का आनंद लेने लगते हैं।

जिंदगी भी इसी तरह चलती रहती है। मैं अगर अपने दोस्तों के साथ मजाक करूं, परिवार के साथ वक्त बिताऊं और आज मर जाऊं तो कोई मलाल नहीं रहेगा।

मैं ये नहीं चाहता कि दोस्तों के साथ बैठकर फोन पर एप्पल के शेयर खरीदता-बेचता रहूं या टेक्नोलॉजी के बारे में बातें करता रहूं।

...मैं आखिर में कहूंगा कि कभी किसी से बहस मत करिए! शायद आपके तर्क खत्म हो जाएं, लेकिन बहस कभी खत्म नहीं होती... और दूसरा हर बहस में एक पक्ष हमेशा हारता है!!
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भूगोल : Guleri ki kahani






एक शिक्षक को अपने इंस्पेक्टर के दौरे का भय हुआ और वह क्लास को भूगोल रटाने लगा। कहने लगा कि पृथ्वी गोल है।

यदि इंस्पेक्टर पूछे कि पृथ्वी का आकार कैसा है और तुम्हें याद न हो तो मैं सुंघनी की डिबिया दिखाऊंगा, उसे देखकर उत्तर देना।

गुरु जी की डिबिया गोल थी!

इंस्पेक्टर ने आकर वही प्रश्न एक विद्यार्थी से किया और उसने बड़ी उत्कंठा से की ओर देखा।

गुरु ने जेब में से चौकोर डिबिया निकाली.. लेकिन भूल से दूसरी डिबिया आ गई थी।

लड़का बोला, "बुधवार को पृथ्वी चौकौर होती है... और बाकी सब दिन गोल।"
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एक सीधा-सादा इंसान! घोर पारिवारिक! घुमक्कड़! चाय प्रेमी! सिनेमाई नशेड़ी! माइक्रो-फिक्शन लेखक!

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