संजय साेलंकी का ब्लाग

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एक सपना और सात प्रयास






"सपने वो नहीं होते, जो आप सोने के बाद देखते हैं, सपने वो होते हैं.. जो आपको सोने नहीं देते।" एपीजे अब्दुल कलाम ने जब ये बात कही होगी, कई कहानियां इसके इर्द-गिर्द बुनी गई होगी। जिद, जुनून और सफलता की कई कहानियां सुनीं होंगीं परंतु यह कहानी कुछ अजीब सी जिद की है। एक होनहार लड़का जो इंजीनियर बन चुका था, अपने गांव में एक हायर सेकेंड्री स्कूल खोलना चाहता था। उसे पता चला कि गांव में स्कूल तो केवल कलेक्टर ही खुलवा सकता है। बस फिर क्या था, नौकरी छोड़ी, पार्टटाइम वेटर का काम किया और आईएएस की तैयारी शुरू कर दी। 1-2-3 नहीं लगातार 6 बार फेल हुआ लेकिन हार नहीं मानी और 7वीं बार यूपीएससी क्लीयर। अब जयगणेश एक आईएएस अफसर है।

जयागणेश के पिता गरीब थे। लेदर फैक्टरी में सुपरवाइजर का काम कर हर महीने सिर्फ 4,500 तक ही कमा पाते थे। परिवार में अक्सर पैसों में कमी रहती थी। चार भाई-बहनों में जयागणेश सबसे बड़े थे ऐसे में बड़े होने के कारण घर की खर्च की जिम्मेदारी भी उन पर ही थी। बता दें, वह शुरू से ही पढ़ाई में अच्छे थे। 12वीं में उनके 91 प्रतिशत अंक आए थे। फिर उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू कर दी।

इंजीनियरिंग की डिग्री मिलने के बाद इन्हें 25,000 प्रति महीना पर एक नौकरी भी मिल गई, लेकिन जल्द ही उन्हें यह एहसास होने लगा कि शिक्षा उनके गांव के बच्चों के लिए भी बेहद जरूरी है। क्योंकि उन्हें गांव के पिछड़ेपन और बच्चों के स्कूल न जाने पर दुख होता था। उन्होंने बताया- उनके गांव के अधिकतर बच्चे 10वीं तक ही पढ़ाई कर पाते थे और कई बच्चों को तो स्कूल का मुंह ही देखना नसीब नहीं होता था। जयगणेश बताते हैं, कि उनके गांव के दोस्त ऑटो चलाते हैं या शहरों में जाकर किसी फैक्ट्री में मजदूरी करते हैं। अपने दोस्तों में वह इकलौते थे जो यहां तक पहुंचे थे।

इसी दौरान उन्हें पता चला कि बदलाव तो केवल कलेक्टर ही ला सकते हैं। इसलिए उन्होंने अपना जॉब छोड़ा और सिविल सर्विस की तैयारी करने शुरू कर दी। जल्द ही किसी से भी मार्गदर्शन नहीं मिलने के कारण रास्ता कठिन दिखने लगा। अपने पहले दो प्रयास में तो ये प्रारंभिक परीक्षा भी नहीं पास कर पाए। बाद में उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग के जगह सोशियोलॉजी को चुना। इसका भी फायदा नहीं हुआ और यह तीसरी बार में भी फेल हो गए।

जिसके बाद उन्हें चेन्नई में सरकारी कोचिंग के बारे में मालूम चला जहां आईएएस की कोचिंग की तैयारी करवाई जाती है। तैयारी करने के लिए ये चेन्नई चले गए। वहां एक सत्यम सिनेमा हॉल के कैंटीन में बिलिंग ऑपरेटर के तौर पर काम मिल गया। जिसके बाद उन्हें इंटरवल के वक्त उन्हें वेटर का काम करना पड़ता था। उन्होंने बताया मुझे मेरा बस एक ही मकसद था। कैसे भी करके IAS ऑफिसर बनना चाहता हूं।

जयागणेश ने काफी मेहनत से पढ़ाई की, फिर भी पांचवी बार में सफलता हासिल नहीं कर पाए। आगे पढ़ाई करने के लिए पैसे की कमी बहुत ज्यादा आड़े आ रही थी। अब उन्होंने यूपीएससी की तैयारी कराने वाले एक कोचिंग में सोशियोलॉजी पढ़ाना शुरू कर दिया। अपने छठे प्रयास में उन्होंने प्रारंभिक परीक्षा तो पास कर ली लेकिन इंटरव्यू पास करने से चूक गए।

छठीं बार असफल होने के बाद भी उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। जिसके बाद उन्होंने 7वीं बार यूपीएससी की परीक्षा दी। जब वे 7वीं बार परीक्षा में बैठे तो प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू भी पास कर गए। उन्हें 7वीं बार में 156वी रैंक मिल गई। और आखिरकार एक सपने का संघर्ष कामयाब हुआ।
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झील और ग्लास : Zen Story in Hindi






एक बार एक युवक किसी ज़ेन गुरु के पास जाकर बोला: "गुरुदेव, मैं अपनी ज़िन्दगी से बहुत परेशान हूँ, कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं!"

गुरु बोले: "पानी के ग्लास में एक मुट्ठी नमक डालो और उसे पीयो।"

युवक ने ऐसा ही किया..!

फिर गुरु ने युवक से पूछा: "इसका स्वाद कैसा लगा?"

युवक थूकते हुए बोला: "बहुत ही खराब… एकदम खारा!"

फिर गुरु मुस्कुराते हुए बोले: "एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक ले लो और मेरे साथ आओ।"

दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील के सामने जाकर रुक गए।

गुरु ने पुनः कहा: अब इस नमक को पानी में दाल दो।"

युवक ने ऐसा ही किया...

गुरु बोले: अब इस झील का पानी पियो।

युवक पानी पीने लगा......

एक बार फिर गुरु ने पूछा: "बताओ इसका स्वाद कैसा है? क्या अभी भी तुम्हे ये खरा लग रहा है?!"

"नहीं, ये तो मीठा है, बहुत अच्छा है", युवक बोला।

अब गुरु युवक के बगल में आकर बैठ गए और उसका हाथ थामते हुए बोले, "जीवन के दुःख बिल्कुल नमक की तरह हैं; न इससे कम ना ज्यादा। जीवन में दुःख की मात्र वही रहती है, बिल्कुल वही। लेकिन हम कितने दुःख का स्वाद लेते हैं ये इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं।

इसलिए जब तुम दुखी हो तो सिर्फ इतना कर सकते हो.. कि खुद को बड़ा कर लो... ग़्लास मत बने रहो!!
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जलन : A story about jealousy






एक समय की बात है। किसी राज्य में चार ब्राम्हण रहते थे। एक दिन उन चारों ने तपस्या करके भगवान को खुश करने और भगवान के आशीर्वाद से अपनी मनो-कामना पूरी करने का विचार किया।

ऐसा विचार करके चारो ब्राम्हण जंगल की तरफ चले गए और तपस्या करने लगे। मौसम बीतें लेकिन उनकी तपस्या अनवरत जारी रही।

अंततः उनकी कठिन तपस्या से भगवान प्रसन्न हो गए और उनके सामने प्रकट हो गए और कहने लगे मैं तुम चारो की तपस्या से खुश हूँ। मांगों, क्या वर मांगते हो!

पहले ब्राम्हण ने कहा भगवान मुझे इस संसार का सबसे आमिर आदमी बना दो। भगवान ने कहा.. तथास्तु! और वह संसार का सबसे अमीर आदमी बन गया।

फिर भगवान ने दूसरे ब्राम्हण से कहा: मैं तुमसे भी खुश हूँ, तुम भी वर मांगों।

दूसरे ब्राम्हण ने कहा मुझे संसार का सबसे सुन्दर इंसान बना दो। भगवान ने फिर कहा.. तथास्तु! और वह संसार में सर्वाधिक सुंदर इंसान बन गया।

फिर भगवान ने तीसरे ब्राम्हण से कहा: मांगो, तुम क्या मांगते हो वत्स!

तीसरे ब्राम्हण ने कहा मुझे दुनिया का सबसे होशियार इंसान बना दो! भगवान नें कहा, तथास्तु!

फिर भगवान ने चौथे ब्राम्हण से कहा, मांगों.. तुम क्या मांगते हो वत्स!?

चौथे ब्राम्हण ने कहा: भगवान मुझे तो बस इतना वर दीजिए की ये तीनो जैसे थे वैसे ही हो जाए।

... अगर किन्ही दो बराबर लकीरों में से पहली को बड़ी बनाना है तो दूसरी लकीर को मिटाकर छोटी करने की बजाये पहली को ही और आगे बड़ा देना चाहिए।

ठीक उसी प्रकार इंसान को भी दूसरे को छोटा करने से बेहतर खुद को बड़ा या बेहतर बनाना चाहिए। क्योंकि दूसरे की प्रगति रोकने के चक्कर में वो खुद की प्रगति भी कम कर सकते है।

... जैसे अगर चौथा ब्राम्हण अपने लिए भी कुछ अच्छा मांग लेता तो भगवान उसे भी दे देते पर उसने जलकर अपने ही तीनो दोस्तों का नुकसान तो किया तो साथ में खुद का भी नुकसान कर लिया!
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स्वयंवर






कहीं किसी नदी के किनारे एक मुनियों का आश्रम था। वहाँ एक मुनिवर रहते थे।

एक दिन जब मुनि नदी के किनारे जल लेकर आचमन कर रहे थे कि अचानक उनकी पानी से भरी हथेली में ऊपर से एक चुहिया आकर गिर गई।

उस चुहिया को आकाश में एक बाज लिये जा रहा था। उसके पंजे से छूटकर वह नीचे गिर गई थी।

मुनि ने उसे पीपल के पत्ते पर रखा और फिर से गंगाजल में स्नान किया। चुहिया में अभी प्राण शेष थे। उसे मुनि ने अपने प्रताप से एक सुंदर कन्या का रुप दे दिया, और अपने आश्रम में ले आये।

मुनि नें अपनी पत्‍नी को कन्या अर्पित करते हुए कहा कि इसे अपनी ही लड़की की तरह पालना।

मुनि की अपनी कोई सन्तान नहीं थी, इसलिये मुनिपत्‍नी ने उसका लालन-पालन बड़े प्रेम से किया। युवावस्था तक वह उनके आश्रम में ही पलती रही।

जब कन्या की विवाह योग्य अवस्था हो गई तो मुनिपत्‍नी ने मुनि से कहा - "हे स्वामी! हमारी कन्या अब विवाह योग्य हो गई है। अतः इसके विवाह का प्रबन्ध कीजिये।"

मुनि ने कहा - "मैं अभी सूर्य को बुलाकर इसे उसके हाथ सौंप देता हूँ। यदि इसे स्वीकार होगा तो उसके साथ विवाह कर लेगी, अन्यथा नहीं।

मुनि ने पूछा: "हे पुत्री! यह त्रिलोक को प्रकाश देने वाला सूर्य, तुम्हें पतिरूप में स्वीकार है?"

पुत्री ने उत्तर दिया - "पिताश्री! यह तो आग जैसा गरम है, मुझे स्वीकार नहीं.. इससे अच्छा कोई वर बुलाइये।"

मुनि ने सूर्य से पूछा कि वह उससे श्रेष्ठ कोई वर बतलाये।

सूर्य ने कहा - "मुझ से अच्छे तो मेघ हैं, जो मुझे ढँककर छिपा लेते हैं।"

मुनि ने मेघ को बुलाकर अपनी पुत्री से पूछा - "क्या यह तुझे पतिरूप में स्वीकार है?"

कन्या ने कहा - "यह तो बहुत काला है.. अतः इससे भी अच्छे किसी वर को बुलाओ।"

मुनि ने मेघ से भी पूछा कि उससे अच्छा कौन है.. मेघ ने कहा, "मुझ से अच्छे तो वायुदेव हैं, जो मुझे उड़ाकर विभिन्न दिशाओं में ले जाते है।"

मुनि ने वायुदेव को बुलाया और पुनः कन्या से स्वीकृति पूछी।

कन्या ने कहा - "पिताश्री! यह तो बड़े ही चंचल है। इनसे भी किसी अच्छे वर को बुलाओ।"

मुनि ने वायुदेव से भी पूछा कि उनसे श्रेष्ठ कौन है.. वायुदेव ने कहा, "मुझ से श्रेष्ठ पर्वत है, जो बड़ी से बड़ी आँधी में भी स्थिर रहता है।"

मुनि ने पर्वत को बुलाया और पुनः अपनी कन्या से पूछा तो उस ने कहा - "पिताश्री! यह तो बड़ा कठोर और गंभीर है, इससे अधिक अच्छा कोई वर बुलाओ।"

मुनि ने पर्वत से कहा कि वह अपने से श्रेष्ठ कोई वर सुझाये। तब पर्वत ने कहा - "मुझ से अच्छा चूहा है, जो मुझे तोड़कर अपना बिल बना लेता है।"

मुनि ने तब चूहे को बुलाया और पुनः कन्या से कहा - "पुत्री! यह चूहा तुझे स्वीकार हो तो इससे विवाह कर ले।"

मुनिकन्या ने चूहें को बड़े ध्यान से देखा। उसके साथ उसे विलक्षण अपनापन अनुभव हो रहा था।

प्रथम दृष्टि में ही वह उस पर मुग्ध हो गई और बोली - "हे पिताश्री! मुझे यह स्वीकार है। आप मुझे चुहिया बनाकर इन चूहे जी के हाथों सौंप दीजिये।"

मुनि ने अपने तपोबल से उसे फिर चुहिया बना दिया और चूहे के साथ उसका विवाह कर दिया।
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गुण - दोष : Story of two buckets






किसी गाँव में एक व्यक्ति को बहुत दूर से पीने के लिए पानी भरकर लाना पड़ता था। उसके पास दो बाल्टियाँ थीं जिन्हें वह एक डंडे के दोनों सिरों पर बांधकर उनमें तालाब से पानी भरकर लाता था।

उन दोनों बाल्टियों में से एक के तले में एक छोटा सा छेद था जबकि दूसरी बाल्टी बहुत अच्छी हालत में थी।

तालाब से घर तक के रास्ते में छेद वाली बाल्टी से पानी रिसता रहता था और घर पहुँचते-पहुँचते उसमें आधा पानी ही बचता था। बहुत लम्बे अरसे तक ऐसा रोज़ होता रहा और किसान सिर्फ डेढ़ बाल्टी पानी लेकर ही घर आता रहा।

अच्छी बाल्टी को यह देखकर अपने ऊपर घमंड हो गया। वह छेदवाली बाल्टी से कहती थी की वह अच्छी बाल्टी है और उसमें से ज़रा सा भी पानी नहीं रिसता। छेदवाली बाल्टी को यह सुनकर बहुत दुःख होता था और उसे अपनी कमी पर शर्म आती थी।

छेदवाली बाल्टी अपने जीवन से पूरी तरह निराश हो चुकी थी। एक दिन रास्ते में उसने किसान से कहा:
मैं अच्छी बाल्टी नहीं हूँ! मेरे तले में छोटे से छेद के कारण पानी रिसता रहता है और तुम्हारे घर तक पहुँचते-पहुँचते मैं आधी खाली हो जाती हूँ।

तब किसान ने छेदवाली बाल्टी से कहा:
क्या तुम देखती हो कि रास्ते में जिस ओर तुम होती हो वहाँ हरियाली है और फूल खिलते हैं लेकिन दूसरी ओर नहीं।

ऐसा इसलिए है कि क्योंकि मैं तुम्हारे तरफ की पगडण्डी में फूलों और पौधों के बीज छिड़कता रहता था जिन्हें तुमसे रिसने वाले पानी से सिंचाई लायक नमी मिल जाती थी।

दो सालों से मैं इसी वजह से ईश्वर को फूल चढ़ा पा रहा हूँ। यदि तुममें वह बात नहीं होती जिसे तुम अपना दोष समझती हो तो हमारे आसपास इतनी सुन्दरता नहीं होती।

.... दोष सबमें होते है। लेकिन हर दोष की बुराई करने की बजाए उसका सही विकल्प तलाश करना चाहिए। क्योंकि कुछ दोष अच्छे हो सकते है।
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पिता, पुत्र और एक सपना : Story of Brooklyn bridge






इंजीनियर जॉन रोबलिंग के जीवन में सन 1883 एक महत्वपूर्ण वर्ष था। इस वर्ष वह न्यूयॉर्क से लांग आईलैंड को जोड़ने के लिए एक शानदार पुल का निर्माण करने के अपने विचार पर अमल करने वाले थे।

यह दुनिया का पहला स्टील वायर सस्पेंशन से बना पुल था और दुनिया में इस तरह का कोई दूसरा पल नहीं बना था, इसलिए यह चर्चा का विषय था। विशेषज्ञों ने इसे एक असंभव उपलब्धि कह कर उनके इस विचार को खारिज कर दिया था। पूरी दुनिया उनके विचार के खिलाफ थी और उन्हे योजना बंद करने के लिए कहा गया।

रोबलिंग की अंतरात्मा उनसे हर पल कहती थी कि उनकी राय पुल के बारे में सही है। रोबलिंग को उसके विचार के लिए सिर्फ एक आदमी का समर्थन प्राप्त था और वो था उनका बेटा वाशिंगटन। वाशिंगटन भी एक इंजिनियर था।

उन्होंने एक विस्तृत योजना तैयार की और आवश्यक टीम को भर्ती किया। उन्होंने पुल निर्माण का काम शुरू किया लेकिन कार्यस्थल पर हुई एक अनहोनी दुर्घटना मे रोबलिंग की मृत्यु हो गई।

आम तौर पर कोई और होता तो इस कार्य को छोड़ देता, लेकिन वाशिंगटन ने अपने पिता का काम पूरा करने का निर्णय लिया क्योंकि उन्हे अपने पिता के सपने पर यकीन था।

इसके बाद एक और अनहोनी हुई। एक दुर्घटना में वाशिंगटन को मस्तिष्क क्षति का सामना करना पड़ा और वह स्थिर हो गये। उन्हे इस हद तक पैरालिसिस हो गया कि न तो चल सकते थे और न ही बात कर सकते थे। यहाँ तक कि वह हिल भी नहीं सकते थे।

वाशिंगटन इतनी खराब तबियत के बावजूद निर्माण कार्य जारी रखना चाहते थे। उन्हे किसी भी हाल में पिता का सपना पूरा करना था।

वह बातचीत करने के लिए अपनी पत्नी पर पूरी तरह से निर्भर करते थे। उन्होंने पत्नी से बातचीत करने के लिए अपनी एक स्वस्थ उंगली का इस्तेमाल किया। अपनी बात संपूर्णता से समझाने हेतु एक कोड प्रणाली विकसित की।

अगले 13 सालों तक उस एक उंगली के दम पर उनकी पत्नी ने उनके निर्देशों को समझा। समझने के बाद वह उन्हे इंजीनियरों को समझाया करती थी।

इंजिनियर उसके निर्देशों पर काम करते गए और आखिरकार ब्रुकलिन ब्रिज हकीकत में बन कर तैयार हो गया।

आज ब्रुकलिन ब्रिज एक शानदार उदाहरण के रूप मे बाधाओं का सामना करने वाले लोगों के लिए एक प्रेरणादायक कहानी के रूप में खड़ा है।

कोई सोच भी नहीं सकता था कि बिस्तर पर लेटा एक इंसान सिर्फ एक ऊंगली के सहारे इतनी बड़ी उपलब्धि हांसिल कर लेगा।

इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि:

1. दूसरों के मजाक उड़ाने के बावजूद हमें बड़े सपने देखना नहीं छोड़ना चाहिए।
2. शारिरिक अंपगता, कठिन परिस्थिती और मुश्किलों को भी हौंसलो के दम पर हराया जा सकता है।
3. दुनिया की सभी सफल लोगों में एक बात समान है कि उन्होंने असाधारण दिक्कतों का सामना किया था।
4. कहते है, "मन के हारे हार है, मन के जीते जीत" यानी कि जब तक आप अपने मन से नहीं हारते, तब तक दुनिया की कोई ताकत आपको नहीं हरा सकती।
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मछलियों की खुशी

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एक दिन च्वांग-त्जु और उनका दोस्त एक तालाब के किनारे बैठे हुए थे।

च्वांग-त्जु ने अपने दोस्त से कहा – उन मछलियों को तैरते हुए देखो! वे कितनी खुश हैं।

तुम खुद तो मछली नहीं हो – उनके दोस्त ने कहा... फ़िर तुम यह कैसे जानते हो कि वे खुश हैं?

तुम भी तो मैं नहीं हो.. च्वांग-त्जु ने कहा... फ़िर तुम यह कैसे जानते हो कि मैं यह नहीं जानता कि मछलियाँ खुश हैं?!
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एक सीधा-सादा इंसान! घोर पारिवारिक! घुमक्कड़! चाय प्रेमी! सिनेमाई नशेड़ी! माइक्रो-फिक्शन लेखक!

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