संजय साेलंकी का ब्लाग

प्रेम






किसी बादशाह की एक फकीर के साथ घनिष्ट मित्रता हो गई। फकीर हमेशा बादशाह की परछाई बन रहता और बादशाह का भी उस फकीर पर बहुत प्रेम हो गया।

एक दिन दोनों शिकार खेलने गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था।

बादशाह ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। बादशाह ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा फकीर को दिया।

फकीर ने टुकड़ा खाया और बोला, "बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया।"

एक टुकड़ा और दे दीजिये। दूसरा टुकड़ा भी फकीर को मिल गया। फकीर ने एक टुकड़ा और बादशाह से मांग लिया। इसी तरह फकीर ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए।

जब फकीर ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो बादशाह ने कहा, "यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, लेकिन तुम मुझसे प्रेम नहीं करते!"

....और ऐसा कहते हुए बादशाह ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। मुंह में रखते ही राजा ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था।

बादशाह बोला, "तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?"

...उस पर फकीर का जवाब था, "जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं? इसलिए सब टुकड़े खुद ही खाता गया ताकि आपको पता न चले।"
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क्रोध, प्रेम, मौन






एक गुरू अपने शिष्यों के साथ नदी के तट पर नहाने पहुँचें। वहाँ पहले से मौजूद एक परिवार के कुछ लोग अचानक ही आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो गए और जोर-जोर से चिल्लाने लगे।

गुरू ने यह देखकर अपने शिष्यों से पुछा;

"क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं?"

शिष्य कुछ देर तक सोचते रहे, फिर उनमें से एक ने उत्तर दिया;

"क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं, इसलिए!”

गुरू ने पुनः प्रश्न किया;

"लेकिन जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है, तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है? उसे जो कहना है वो आप धीमी आवाज़ में भी तो कह सकते हैं"।

कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देने का प्रयास किया लेकिन बाकी लोग संतुष्ट नहीं हुए।

अंततः गुरू ने समझाया…

"जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं। और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते। वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा।"

"और क्या होता है जब दो लोग प्रेम में होते हैं? तब वे चिल्लाते नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, और उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है।”

...और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है?

अंत में गुरू ने कहा; "तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं।”
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एक सपना और सात प्रयास






"सपने वो नहीं होते, जो आप सोने के बाद देखते हैं, सपने वो होते हैं.. जो आपको सोने नहीं देते।" एपीजे अब्दुल कलाम ने जब ये बात कही होगी, कई कहानियां इसके इर्द-गिर्द बुनी गई होगी। जिद, जुनून और सफलता की कई कहानियां सुनीं होंगीं परंतु यह कहानी कुछ अजीब सी जिद की है। एक होनहार लड़का जो इंजीनियर बन चुका था, अपने गांव में एक हायर सेकेंड्री स्कूल खोलना चाहता था। उसे पता चला कि गांव में स्कूल तो केवल कलेक्टर ही खुलवा सकता है। बस फिर क्या था, नौकरी छोड़ी, पार्टटाइम वेटर का काम किया और आईएएस की तैयारी शुरू कर दी। 1-2-3 नहीं लगातार 6 बार फेल हुआ लेकिन हार नहीं मानी और 7वीं बार यूपीएससी क्लीयर। अब जयगणेश एक आईएएस अफसर है।

जयागणेश के पिता गरीब थे। लेदर फैक्टरी में सुपरवाइजर का काम कर हर महीने सिर्फ 4,500 तक ही कमा पाते थे। परिवार में अक्सर पैसों में कमी रहती थी। चार भाई-बहनों में जयागणेश सबसे बड़े थे ऐसे में बड़े होने के कारण घर की खर्च की जिम्मेदारी भी उन पर ही थी। बता दें, वह शुरू से ही पढ़ाई में अच्छे थे। 12वीं में उनके 91 प्रतिशत अंक आए थे। फिर उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू कर दी।

इंजीनियरिंग की डिग्री मिलने के बाद इन्हें 25,000 प्रति महीना पर एक नौकरी भी मिल गई, लेकिन जल्द ही उन्हें यह एहसास होने लगा कि शिक्षा उनके गांव के बच्चों के लिए भी बेहद जरूरी है। क्योंकि उन्हें गांव के पिछड़ेपन और बच्चों के स्कूल न जाने पर दुख होता था। उन्होंने बताया- उनके गांव के अधिकतर बच्चे 10वीं तक ही पढ़ाई कर पाते थे और कई बच्चों को तो स्कूल का मुंह ही देखना नसीब नहीं होता था। जयगणेश बताते हैं, कि उनके गांव के दोस्त ऑटो चलाते हैं या शहरों में जाकर किसी फैक्ट्री में मजदूरी करते हैं। अपने दोस्तों में वह इकलौते थे जो यहां तक पहुंचे थे।

इसी दौरान उन्हें पता चला कि बदलाव तो केवल कलेक्टर ही ला सकते हैं। इसलिए उन्होंने अपना जॉब छोड़ा और सिविल सर्विस की तैयारी करने शुरू कर दी। जल्द ही किसी से भी मार्गदर्शन नहीं मिलने के कारण रास्ता कठिन दिखने लगा। अपने पहले दो प्रयास में तो ये प्रारंभिक परीक्षा भी नहीं पास कर पाए। बाद में उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग के जगह सोशियोलॉजी को चुना। इसका भी फायदा नहीं हुआ और यह तीसरी बार में भी फेल हो गए।

जिसके बाद उन्हें चेन्नई में सरकारी कोचिंग के बारे में मालूम चला जहां आईएएस की कोचिंग की तैयारी करवाई जाती है। तैयारी करने के लिए ये चेन्नई चले गए। वहां एक सत्यम सिनेमा हॉल के कैंटीन में बिलिंग ऑपरेटर के तौर पर काम मिल गया। जिसके बाद उन्हें इंटरवल के वक्त उन्हें वेटर का काम करना पड़ता था। उन्होंने बताया मुझे मेरा बस एक ही मकसद था। कैसे भी करके IAS ऑफिसर बनना चाहता हूं।

जयागणेश ने काफी मेहनत से पढ़ाई की, फिर भी पांचवी बार में सफलता हासिल नहीं कर पाए। आगे पढ़ाई करने के लिए पैसे की कमी बहुत ज्यादा आड़े आ रही थी। अब उन्होंने यूपीएससी की तैयारी कराने वाले एक कोचिंग में सोशियोलॉजी पढ़ाना शुरू कर दिया। अपने छठे प्रयास में उन्होंने प्रारंभिक परीक्षा तो पास कर ली लेकिन इंटरव्यू पास करने से चूक गए।

छठीं बार असफल होने के बाद भी उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। जिसके बाद उन्होंने 7वीं बार यूपीएससी की परीक्षा दी। जब वे 7वीं बार परीक्षा में बैठे तो प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू भी पास कर गए। उन्हें 7वीं बार में 156वी रैंक मिल गई। और आखिरकार एक सपने का संघर्ष कामयाब हुआ।
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एक सच्ची कहानी






क्या कभी किसी झाड़ू लगाने वाली बाई का भी विदाई सहारोह होता है क्या?
दिल को छू जाने वाली, एक सच्ची कहानी!

सुमित्रा देवी जी रजरप्पा, झारखण्ड में तीस साल तक सड़कें साफ़ करने का काम करती थीं। एकदम शांत स्वाभाव से वह चुप-चाप अपना काम करती चली गयीं और एक दिन उनके रिटायरमेंट का समय भी आ गया। मोहल्ले के लोगों ने सोचा की तीस सालों के इस जान पहचान को एक अच्छा मोड़ देना चाहिए।

वैसे तो वह एक गरीब-दलित फोर्थ-ग्रेड की सरकारी कर्मचारी थी। लेकिन फिर भी सब ने मिलकर एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित किया जिसमे सुमित्रा जी के साथ काम करने वाले और लोगो को भी बुलाया।

अभी हँसी-मज़ाक, बात-चीत चल ही रही थी की अचानक वहाँ एक के बाद एक तीन गाड़ियां रुकीं जिनमे से एक गाड़ी नीली बत्ती वाली भी थी। सब लोग एक दुसरे की और देखने लगे की यह सब क्या हो रहा है?!

लेकिन तभी सुमित्रा जी की आँखों से तो आँसू की धार निकल पड़ी थी। तीनो गाड़ियों से उतरे हुए वह तीन नौजवान युवकों ने सुमित्रा जी की पैर छुए और उन्हें गले लगा लिया! उस समय वहाँ मौजूद लोगों को पता चला की यह तीन तो उनके अपने बेटे ही हैं!

जब आँसू थमे तो सुमित्रा जी बोलीं- "साहब, मैंने तीस सालों से यह सड़के साफ़ की हैं और मुझे अब कोई शिकायत भी नहीं है। आज मेरे बच्चे भी आप लोगों जैसे 'साहब' बन गए"!

उन्होंने अपने तीनों बेटों का वहां मौजूद अपने अधिकारियों से परिचय कराया तो सभी लोग सकते में आ गए। फिर सुमित्रा देवी बोलीं, "साहब, मैं तो पूरी जिंदगी झाड़ू लगाती रही, लेकिन मैंने अपने तीनों बेटों को साहब बना दिया।

यह मेरा बड़ा बेटा वीरेंद्र कुमार है जो रेलवे में इंजीनियर है, यह दूसरा बेटा धीरेन्द्र कुमार डॉक्टर है और यह मिलिये मेरे छोटे बेटे से, जो सिवान जिले का डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर है।

सीवान के कलक्टर महेन्द्र कुमार ने बड़े ही भावुक अंदाज में कहा, "कभी भी विपरीत हालात से हार नहीं मानना चाहिए। सोचिए मेरी माँ ने झाड़ू लगा-लगाकर हम तीनों भाइयों को पढ़ाकर आज इस मुकाम तक पहुंचा दिया। चाहे जितने भी मुश्किलें आयीं माँ ने उनकी शिक्षा नहीं रुकने दी। चाहे एक दिन खाना भले ही कम खाया हो, लेकिन स्कूल की किताबें हमेशा पूरी थीं। हम सामाजिक-आर्थिक तौर पर बड़े कमजोर थे, लेकिन मेरी माँ का साहस और उनका निष्ठा ने हमें आज इस मुकाम पर पहुंचा दिया। हमारी प्रेरणा हमारी मां हैं।"

जब बेटे नौकरी करने लगे तो माँ को बहुत मनाया की अब तो सड़क पर झाड़ू का काम छोड़ दें पर सुमित्रा जी ने उन्हें समझाया की हम चाहे जितने भी बड़े हो जाएँ, अपनी जड़ें कभी नहीं भूलनी चाहियें। यह वही नौकरी थी जिसकी वजह से तीनो बेटों ने अपनी पढ़ाई पूरी की और रिटायरमेंट के दिन तक वो इस काम को नहीं छोड़ेंगी।
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टीस






सब कुछ हो रहा है, जीवन चलता जा रहा है। इसी बीच हर शाम एक टीस उठती है। और हर सुबह चली जाती है। टीस उठने या उसके जाने से मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ता। शायद निर्मोही होना भी एक वरदान है। लेकिन फिर भी, मैं हर टीस की हर एक कहानी में शामिल रहता हूँ। हर टीस के उठने से पहले की कई कहानियाँ आँखों के सामने चलने लगती है।

कहानियाँ जिनमें कभी मैं खुद को रेत के गहरे समंदर में पाता हूँ। तो कभी ऊँट लेकर बंजारों के साथ हो जाता हूँ। बंजारें जिन्हें देखकर अक्सर एक अजीब सा एहसास होता है। कौन होते है ये? कैसा जीवन है इनका? बारिश हो या ठंड, बस चलते जाने जाना.. चाहे खुशी हो या गम, बस चलते जाना.. और अगर इस सफर में कोई साथी खो जाए तो? तो क्या फिर ये सफर पूरा किया जा सकता है? वाकई, जीवन कितना मुश्किल होता है ना?

क्योंकि इस भागते-दौड़ते जीवन में अगर एक बार बिछड़ गए तो मिलना मुश्किल होता है। हमारे इस जीवन में प्यार तो होता है, लेकिन व्यापार नहीं होता। नाव तो होती है, लेकिन किनारा नहीं होता। मंज़िल तो होती है, लेकिन कारवाँ नहीं होता। ऐसे में बिछड़ना, एक अलग राह पर चलना, जिसमें ना कोई खैर, ना कोई खबर.. वाकई मुश्किल होता होगा।

लेकिन अगर बंजारों की तरह ही जिया जाए तो जीवन कभी मुश्किल नहीं होता। वह तो बस बिना बताए हमारा इम्तिहान लेते रहता है। जिसमें लोग आते है, कुछ वक्त साथ रहते है.. और फिर बिछड़ जाते है। इसी का नाम जिंदगी है। जिसमें अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं होता.. होती है तो कुछ कहानियाँ, जिन्हें जीना होता है.. खूब जीना होता है, क्योंकि जीवन की हर कहानी बेहद स्पेशल होती है।
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चे ग्वेरा का लाल सलाम


आज जब JNU में लाल सलाम गूंजता है तो कहीं दूर से एक तस्वीर नज़र आती है.. तस्वीर अर्नेस्तो चे ग्वेरा की.. चे ग्वेरा, एक ऐसा नाम.. जिसका नाम आज भी दुनिया के मजलूमों के लिए एक मिसाल है। युवाओं और क्रांतिकारियों के लिए चे ग्वेरा आज भी एक प्रेरणास्रोत हैं। एक क्रांतिकारी के रूप में जो स्थान भगत सिंह का हिंदुस्तान में है वही स्थान चे ग्वेरा का लैटिन अमरिका सहित पूरी दुनिया में है।

आखिर कैसे अर्जेंटीना में पैदा हुआ लड़का क्यूबा की आजादी का हीरो बन गया.. आखिर कैसे डॉक्टर बनने का ख्वाब पाले लड़का, पूरी दुनिया में क्रांति का प्रणेता बन गया! चे ग्वेरा ने युवावस्था में अपनी मोटरसाइकिल से अर्जेंटिना की करीब 12 हजार किमी की लंबी यात्रा की। यात्राएं जिन्होंने उन्हें असली दुनिया से रूबरू कराया। यात्राएं जिसने उन्हें जीना सिखाया.. उन्होंने अपनी यात्रा संस्मरणों पर किताब भी लिखी थी- मोटरसाइकिल डायरीज। जिस पर सन 2004 में फिल्म भी बनी।

अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई के दौरान चे ग्वेरा पूरे लैटिन अमरीका में खूब घूमें। और इन दौरान समाज में व्याप्त गरीबी, भुखमरी, असमानता और घोर शोषण ने उन्हें हिलाकर रख दिया। और इसके लिये उन्होंने एकाधिप्तय पूंजीवाद, नव उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को जिम्मेदार माना, और इनसे छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका था - विश्व क्रांति!


तो बस.. चे ग्वेरा ने अपनी डॉक्टरी का झोला बंद किया और क्रांति की तलाश में चल दिये.. ग्वांटेमाला में काम करते हुए उन्होंने अरबेंज के समाजवादी शासन के खिलाफ सीआईए की सजिशों को देखा जिससे उनके दिल में अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिए नफरत भर गई।

इस दौरान उन्होंने ग्वान्टेमाला के राष्ट्रपति गुज़मान के द्वारा किए जा रहे समाज सुधारों में भाग लिया। उनकी क्रांतिकारी सोच और मजबूत हो गई जब 1954 में गुज़मान को अमरीका की मदद से हटा दिया गया। इसके कुछ ही समय बाद मेक्सिको सिटी में इन्हें राऊल कास्त्रो और फिदेल कास्त्रो मिले और ये क्यूबा की 26 जुलाई क्रांति में शामिल हो गए।

चे ग्वेरा जल्द ही क्रांतिकारियों की कमान में दूसरे स्थान तक पहुँच गए और बातिस्ता के राज्य के विरुद्ध दो साल तक चले अभियान में इन्होंने मुख्य भूमिका निभाई।

चे ग्वेरा के विरोधी उन्हें एक खूंखार हत्यारा कहते हैं। लेकिन चे ग्वेरा एक लड़ाके थे जिन्हें दुनिया के गरीबो-शोषितो से प्यार था। उनका कहना था कि एक सच्चा क्रांतिकारी प्यार की गहरी भावना से संचालित होता है। उनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि वे किसी भी विचारधारा की कमी और मजबूती को अच्छे से समझते थे। वे यह भी समझते कि हर देश की भौतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार शोषण के खिलाफ लड़ाई के अलग-अलग रूप हो सकते हैं।

चे ग्वेरा का साफ-साफ मानना था कि आजादी की लड़ाई भूख से ही जन्म लेती है। और दुनिया में हो रहे अत्याचार को दूर करने के लिए वो क्यूबा की सरकार में मंत्री बनकर राज़ करने की बजाए क्यूबा को छोड़ अफ्रीका के कांगो के जंगलों में क्रांतिकारियों को गुरिल्ला युद्ध सिखाने चले गए। इसके बाद उन्होंने अमरिका समर्थित बोलिविया में भी क्रांति लाने का प्रयास किया। लेकिन पकड़े गए और उन्हें गोली मार दी गई।


मरते वक्त चे ग्वेरा ने अपने दुश्मन बोलिवियाई सार्जेंट टेरान से कहा था- तुम एक इंसान को मार रहे हो, पर उसके विचार को नहीं मार सकते।
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शाम की चाय


शाम के वक़्त जब स्कूल से अपने घरों को लौट चुके बच्चों के अलावा सब कुछ शांत है। तभी घड़ी ने गिनकर छह घंटियाँ लगा दी है। शायद वह याद दिला रही है कि चाय का समय हो गया है। कहते है, जब भी चाय की बात हो तो चाय बना ही लेना चाहिए। इसलिए मैं चाय बनाने जाता हूँ। अब मैं अक्सर चंदन दास को सुनने लगा हूँ। वाकई ग़ज़लें शाम की चाय का नशा दुगुना कर देती है।

नशे में मदहोश मन चाय के उबाल के साथ कुछ ख़्याल ले आता है। और इन्हीं ख्यालों के बीच अचानक बारिश शुरू हो जाती है। आसमान में बारिश की बूंदों के बीच उन पंछियों की कतार नज़र आती है, जो अब घरों की ओर लौट रहे है। और उन्हें देखकर मैं सोचता हूँ कि सब कुछ वैसा ही रहेगा.. जैसा था! बस मेरा रूटीन बदल जायेगा। जिसमें शाम को जब लौटेंगे परिंदे, तो मैं भी लौट आऊँगा। और सुबह जब वो उड़ेंगे, तो उनके संग मैं भी उड़ जाऊँगा।

और इन्हीं ख्यालों से धुंध हटने तक तक चाय कुछ ठंडी हो जाती है। ठीक वैसी, जैसी मुझे पसंद है।
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कभी कभी




कभी-कभी
हमें चलना होता है
तब भी,
जब कोई राह ना हो
और ना कोई राहगीर हो।
तब इस,
चलने की इस चाहत में
बिना पैरों के भी
हम नाप लेते है जीवन
जब चलते है पाँव-पाँव।


कभी-कभी
हमें तैरना होता है।
तब भी,
जब कोई नदी ना हो
और ना कोई किनारा हो!
तब भी,
इन लहरों को पार करके
हम तैरते जातें है
इस उम्मीद में,
कि आएगा कोई
आकर थामेगा हमारा हाथ
तब इस उम्मीद में
उथले बहते पानी में हम
चलने लगते है पाँव-पाँव।


कभी-कभी
हमें उड़ना होता है
तब भी,
जब कोई बादल ना हो
और उड़ने के लिए
ना ही खुला आसमान हो
ना किसी का संग हो
और ना ही अपना कोई पंख हो।


लेकिन फिर भी,
हम उड़ते है
क्योंकि इस जीवन में
कभी-कभी,
बिना पंखों के भी उड़ना पड़ता है।
और उड़ने की ख्वाहिश में
अक्सर इस
ज़मीन पर हम,
चलने लगते है पाँव-पाँव।


 


 

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पैरों के निशान..






एक भक्त था वह भगवान को बहुत मानता था, बड़े प्रेम और भाव से उनकी सेवा किया करता था, एक दिन भगवान से कहने लगा:

मैं आपकी इतनी भक्ति करता हूँ पर आज तक मुझे आपकी अनुभूति नहीं हुई।
मैं चाहता हूँ कि आप भले ही मुझे दर्शन ना दे पर ऐसा कुछ कीजिये की मुझे ये अनुभव हो की आप हो..
भगवान ने कहा ठीक है।

तुम रोज सुबह समुद्र के किनारे सैर पर जाते हो, जब तुम रेत पर चलोगे तो तुम्हे दो पैरो की जगह चार पैर दिखाई देगे,
दो तुम्हारे पैर होगे और दो पैरो के निशान मेरे होगे।
इस तरह तुम्हे मेरी अनुभूति होगी अगले दिन वह सैर पर गया, जब वह रे़त पर चलने लगा तो उसे अपने पैरों के साथ-साथ दो पैर और भी दिखाई दिये वह बड़ा खुश हुआ..
अब रोज ऐसा होने लगा।

एक बार उसे व्यापार में घाटा हुआ सब कुछ चला गया, वह रोड पर आ गया उसके अपनो ने उसका साथ छोड दिया।
देखो यही इस दुनिया की प्रॉब्लम है, मुसीबत में सब साथ छोड देते है।
अब वह सैर पर गया तो उसे चार पैरों की जगह दो पैर दिखाई दिये,
उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि बुरे वक्त मे भगवन ने साथ छोड दिया।
धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होने लगा फिर सब लोग उसके पास वापस आने लगे।

एक दिन जब वह सैर पर गया तो उसने देखा कि चार पैर वापस दिखाई देने लगे।
उससे अब रहा नही गया..
वह बोला:
भगवान जब मेरा बुरा वक्त था तो सब ने मेरा साथ छोड़ दिया था पर मुझे इस बात का गम नहीं था क्योकि इस दुनिया में ऐसा ही होता है, पर आप ने भी उस समय मेरा साथ छोड़ दिया था, ऐसा क्यों किया?

भगवान ने कहा:
तुमने ये कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारा साथ छोड़ दूँगा, तुम्हारे बुरे वक्त में जो रेत पर तुमने दो पैर के निशान देखे वे
तुम्हारे पैरों के नहीं मेरे पैरों के थे, उस समय में तुम्हे अपनी गोद में उठाकर चलता था और आज जब तुम्हारा बुरा वक्त खत्म हो गया तो मैंने तुम्हे नीचे उतार दिया है, इसलिए तुम्हे फिर से चार पैर दिखाई दे रहे है।
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रहस्य

बचपन में अक्सर घर की दीवार पर, बिजली के मीटर में या घड़ी के ऊपर या कभी किसी रोशनदान में कोई ना कोई घोंसला दिख ही जाता था। उस घोंसले को देखकर बड़ा कौतूहल होता था, कौतूहल था ये देखना कि कैसे एक नन्हें से घोंसले में एक नन्हे से पंछी की एक नन्ही कहानी अपना जीवन जी रही है। कहानी, जो घर के अंदर से लेकर बाहर पेड़ों की ओटर तक में छुपी हुई है। ये अनकही कहानी और छुपे हुए घोंसलें मुझे आकर्षित करते रहे है। लेकिन आकर्षण घोंसलें का नहीं है, आकर्षण रहा है एक रहस्य का.. और ये रहस्य है एक कौवे का और एक कोयल का.. उनके प्रेम का या उनके वैमनस्य का।

रहस्य, जिसमें कोयल न तो कभी अपना घोंसला बनाती है और न ही कभी अपने बच्चे पालती है। वह तो हमेशा आजाद रहना चाहती है, और इसलिए बेफिक्र होकर बागों में यहाँ वहाँ फुदकती रहती है। और कुहू-कुहू करके प्रेम के गीत गाती रहती है। और जब प्रेम से उसका मन भर जाता है और उसके अंडे देने का समय आता है तो वह किसी कौवे के घोंसलें में जाकर उसके कुछ अंडो को नीचे गिराकर उनकी जगह अपने अंडे रख आती है। एक से अंडे होने के कारण बेचारा कौआ उन्हें पहचान नहीं पाता। और बच्चों का रंग भी मिलता-जुलता रहता है, इस कारण जब तक बच्चे बोलने नहीं लगते, तब तक वह उन्हें पहचान नहीं पाता।

लेकिन जैसे ही कौवे को यह पता चलता है कि वह जिसकी देखभाल कर रहा है वह कौवे का बच्चा, उसका अपना बच्चा नहीं बल्कि पराई कोयल है.. तो वह उसी वक़्त उन बच्चों को बड़ी ही बेदर्दी के साथ घोंसले से नीचे गिरा देता है। और ऐसा हर कोयल के साथ होता है। कभी किसी के साथ जल्दी, तो किसी के साथ देर से। कोई कोयल मर जाती है। तो कोई घोंसले से गिरने के बाद भी कुहकुहाने के लिए बच जाती है।

यह क्रम अनवरत चलता रहा है और आगे भी यूँ ही चलता रहेगा। और इसी के साथ बना रहेगा एक रहस्य.. रहस्य कि जब दोनों पंछी ही एक जैसे है तो दोनों एक साथ क्यों नहीं रह सकते? रहस्य की उनमें भेद किसने किया? रहस्य की क्या वो अपने समाज से डरते है? रहस्य कि कौवा किस जाति का है और कोयल किस जाति की?

और यह रहस्य तो हमेशा एक रहस्य ही बना रहेगा। लेकिन हकीकत है तो बस इतनी ही कि कोयल अपनी मर्ज़ी से जीवन जीना चाहती है, इसलिए वह शादी में यकीन नहीं रखती और कौवा एक सामाजिक प्राणी है, इसलिए वह कभी लव मैरिज नहीं करता।

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कल

अगर कल
दिन बुरा था
तो रुकिये
गहरी सांस लीजिये
और उम्मीद रखिये
की आज दिन
बहुत अच्छा होगा।
और अगर
कल का दिन
अच्छा ही था
तो रुकिये नहीं
हो सकता है कि
सफलता का सिलसिला
अभी बस शुरू हुआ ही हो।


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- संजय © 2018


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यादें

ना मिटाओ मेरी यादों को
मेरी जगह दे दो
किसी ओर को
ऐसा तुमनें कहा था
लेकिन तुम्हें पता नहीं
ये सब इंसान के हाथों में नहीं
इसलिए शायद मुश्किल हैं
मुश्किल है, शायद नामुमकिन
क्योंकि तुम्हारी यादें
महज़ कोई याद नहीं
वो तो यादों से भरा
एक घोंसला है
और उस घोंसले में
अपना घर बनाकर
हर रोज़ मैं रहा करूँगा

वह घर
जो लगता है
अपना सा
किसी नए सपने सा
हाँ, जीवन के इस वृक्ष में
जब कोई पंछी रहने आएगा
मैं लाकर दूँगा उसे दाना-पानी
रखूँगा खूब ख्याल
कभी साथ खेलूँगा
तो कभी कोई गीत सुनाऊंगा

गीत सुनते हुए
समय दौड़ेगा
तेज़ रफ़्तार से
और वृक्ष फले-फूलेगा
बड़े ही प्यार से
लेकिन अबके जो आएगा
वो बनाएगा
एक नया घोंसला
जो होगा
पिछले घोंसले से बेहतर
बेहतर होंगे तिनके
और बेहतर होगी दुनिया
जिसमे वो नया पंछी गायेगा
और दुनिया को
अपनी मौजूदगी का एहसास कराएगा
उसमें होगी लाखों खूबियां
वो खुशियों को
एक नए सिरे से सजायेगा
फिर भी तुम्हारी जगह
कोई और नहीं ले पायेगा

जीवन के खेल में
कोई दूसरा मौका नहीं मिलता
इसलिए इस कमी को भरने के लिए
हर रोज़
कतरा-कतरा
कुछ यादें मिटा रहा हूँ
वजह चाहे जो भी हो
तुम्हारी यादें मेरी निजी है
ठीक वैसे ही
जैसे मेरा जीवन
अब किसी ओर की निधि है
चाहे मैं खुद
तुम्हें भूल जाऊँगा
लेकिन तुम्हारी जगह
किसी ओर को नहीं दे पाउँगा!
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- संजय © 2018


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उम्मीद

मेरी नींद के अंदर भी एक नींद है। वह नींद जिसमें ढेरो किस्से पलते है और ख्वाब उन्हें पंखे झलते है। ख्वाब जिनमें जागने से पहले मैं कोई और होता हूँ और जागते ही उन यादों को मैं खो देता हूँ। घर का ठंडा फर्श और बाहर के बरसते बादल एहसास कराते है कि आज फिर कोई ख्वाब टूटा है। इस उम्मीद में कि वो ख्वाब फिर दोबारा आएगा, मैं फर्श पर पैर रखने से पहले, धीमे-धीमे ख्वाबों के किरचें उठाकर करीने से सजाता हूँ।

....और एक नई रात की उम्मीद में एक नए दिन की ओर कदम बढ़ाता हूँ।
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- संजय, 2018

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तलाश

खुद की तलाश में अक्सर खुद को पहले लिखना होता है। मैं बहुत दिनों के बाद लिखने बैठा हूँ। लग रहा है जैसे कुछ दिन पहले ही की तो बात है.. मैं या तो लिख रहा था या फिर लिखना चाह रहा था। देखो! अभी भी मैंने कुछ लाइने उकेरी थी, लेकिन अब मैं उन्हें मिटा रहा हूँ। क्योंकि मैं अब लिखता नहीं। अब मैं खोजता हूँ।

मैं खोजता हूँ एकाकी परछाइयों में, और कभी अपने मन की गहराइयों में.. फिर जब खोजते-खोजते मैं थक जाता हूँ, तो मैं खुद को खुद से दूर पाता हूँ। लगता है मेरी खुद की खुद से ही लड़ाई हो गई है। मेरे भीतर कहीं कोई फांस चुभ गई है, और मेरा गला सूखने लगा है। अब मैं गला तर करने के लिए चाय बनाता हूँ। चाय में उबलते बुलबुलों को देखकर मन में कई ख्वाब उबलते है। ख्वाब जिनमें मेरे कुछ दोस्त-यार और कुछ रिश्तेदार है.. जिनसे खूब बातें होती है, खूब हँसी-मज़ाक भी और बेवजह का रोना-गाना भी। लेकिन बातों ही बातों में इन सबके बीच से मैं गायब हो रहा हूँ। क्योंकि मुझे लड़ने जाना है।

अब मैं सुपर मारियो हूँ। और जीवन के युद्ध में मुझे लगातार लड़ते जाना है। वह जीवन, जिसमें कोई लाईफलाइन भी नहीं है.. मैं लड़ रहा हूँ, रास्तें में आ रही हर कठिनाई को, हर हार को पार करके.. मैं बस जीतना चाहता हूँ। क्योंकि इस खेल में मैं अकेला नहीं हूँ, इसमें एक रानी भी है, जिसे मुझे जीताना है। उसे जीताना है क्योंकि इस खेल में उसकी जीत ही मेरी जीत है।

और खेल तो अब भी खत्म नहीं हुआ, लेकिन मैं जान जाता हूँ.. यहाँ जीत-हार मायने नहीं रखता, मायने रखता है तो बार-बार इस जीत-हार के सफर पर जाना.. ठीक वैसे ही जैसे खुद की तलाश में खुद को पा लेना जरूरी नहीं, जितना जरूरी है खुद को तलाश करना।

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- संजय © 2018

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उड़ान

एक सपना है, जिसे एक लड़का देखता है। लड़का जिसका सपना देखता है, वह एक चिड़िया है। लड़का अक्सर चिड़िया का ही सपना देखता है, क्योंकि किसी दिन वह भी उसकी तरह बंधे हुए आसमान में खुलकर उड़ना चाहता है।

और ये जो चिड़िया है, वो बस खुद में ही खोई रहती है। और मासूम तो वह इतनी है कि सपनों की दुनिया में बस कुछ देर उसका नाम भर लेते रहने से वह सपनों में आ जाया करती है। जब वह आती है, तब लड़का उससे बात करना चाहता है, लेकिन अपने ही सपनों की भीड़ में भी उसे अकेले बात करने के लिए प्राइवेसी नहीं मिलती। सच भी तो है, इस भीड़ भरी दुनिया में सुकून से बैठकर बात करने के लिए कोई जगह बची भी तो नहीं है।

अब प्राइवेसी की तलाश में लड़का छत पर आ जाता है। वह मोबाइल में कुछ टाइप कर रहा है, या फिर कोई खेल, खेल रहा है। मोबाईल में व्यस्तता के बीच अचानक उसे किसी की मौजूदगी का एहसास होता है, वह एक उड़ती निगाह से सामनें की ओर देखता है.. पता नहीं कब, कहा से, चुपके से वह चिड़िया वहां आ गई है, और उसके सामने आकर बैठ गई है। अब लड़का चिड़िया से बात करना चाहता है, लेकिन वह कुछ बोल ही नहीं पाता, फिर उसे याद आता है.. उसे तो चिड़ियों की बोली बोलना आता ही नहीं.. और इस तरह से उनकी बात एक बार फिर अधूरी रह जाती है।
वाकई, बात शुरू होने से पहले कितनी मुश्किल होती है।

खैर कहानी आगे बढ़ती है। अब चिड़िया अक्सर उस घर की छत पर आ जाया करती है। रोज़-रोज़ की मुलाकातों की वजह से अब लड़के की माँ को भी चिड़िया पसंद आ गई है। और शायद चिड़िया भी माँ को पसंद करने लगी है। हाँ, वाकई ऐसा लगता है क्योंकि माँ जब भी छत पर कोई काम करने आती है, चिड़िया भी वहाँ आकर उन्हें टुकुर-टुकुर ताकती रहती है.. और उसे देखकर ऐसा लगता है जैसे वह घर के कामों में माँ का हाथ बराबरी से बटा रही हो।

अब घर के काम भी हो रहे है और घर में इतना कुछ घट भी रहा है, लेकिन लड़का अब भी अपने मोबाइल में ही उलझा हुआ है। उसे अपने आसपास से बेखबर रहने की आदत सी हो गई है। खैर आदत तो अब चिड़िया को भी इस घर की लग गई है, क्योंकि अब वह भी सीढ़ियों से चढ़ते-उतरते समय आखिरी दो-तीन सीढ़िया उड़कर नहीं, फुदक कर चढ़ती है। मानो चिड़िया कोई चिड़िया नहीं.. एक लड़की हो।

लड़की, जो घर की छत पर या तो कपड़े सुखाने आती है या कभी कोई और काम करने.. और सारा दिन इन सब कामों के बीच में वह बस थोड़ा-सा ही आराम कर पाती है। कभी-कभी तो वह आराम करते हुए ही दौड़ लगा देती है। और कभी दौड़ते-दौड़ते ही उड़ जाती है। उड़ जाती है, जैसे आसमान छूने की तलाश में बादलों की सवारी करना चाहती हो.. ठीक वैसे उड़ जाती है, जैसे बेवक़्त आगे होकर दुनिया को जीत लेना चाहती हो।

लेकिन चिड़िया की उन्मुक्त उड़ान से लड़का परेशान हो जाता है। उसने चिड़िया की तरह उड़ने की चाह में अब जमीन पर चलना भी बंद कर दिया है। अब उसे सारी चिड़ियाओं की उड़ान से ही तकलीफ हो गई है.. इसलिए वह खुद उड़ने की बजाये अब अपनी ही चिड़िया के पर कतर देना चाहता है।

और जैसा कि इस दुनिया में हमेशा से होता आया है.. बरसो धूप तक में जलने और ठंड में ठिठुरते रहने के बाद एक दिन अनमना लड़का उस चिड़िया के पंख चुराकर उड़ जाता है।

चिड़िया गायब हो जाती है.. और सपना खत्म हो जाता है।

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- संजय © 2018

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खिड़की

जुलाई की किसी सुबह जब घर से बाहर देखता हूँ तो मेरी निगाहें उस ओर जाती है, जहाँ खिड़की है। क्योंकि वहाँ नज़र आती है बारिश की कुछ बूँदें.. चुपचाप खिड़की के बाहर गिरती हुई और बाहर नज़र आती है धरती, आसमान से मिलती हुई।

और बारिश की रिमझिम बूंदें खूबसूरती से भरी एक परिपूर्ण दुनियाँ बना लेती है। तब खिड़की इस खूबसूरत तस्वीर को लिखने के लिए मुझे बुलाती है, और मैं एक खाली कैनवास लेकर खिड़की के किनारे बैठ जाता हूँ।

फिर मैं लिखता हूँ खिड़की.. खिड़की, जिससे हम दुनियाँ को देखते है। वह खिड़की, जो कभी लोगों को आँकती नहीं। उसे फर्क नहीं पड़ता कि उसके पार कोई छोटा बच्चा झाँक रहा है या कोई बड़ा। बाहरी दुनियां चाहे घटती-बढ़ती रहे, यह खिड़की कभी छोटी-बड़ी नहीं होती। यह कभी तो थोड़े में बहुत कुछ देख लेती है, और कभी तो बहुत कुछ देखकर भी अपनी आंखें बंद कर लेती है।

किसी घर का सबसे सुकून भरा कोना उसकी खिड़की होती है। जब कभी अकेलेपन का एहसास हो तो खिड़की किनारे बैठकर आप चाँद को देख सकते है। और किसी को कब और कितना याद किया, उसका हिसाब किया करते हैं। और जब ज्यादा ही दुःखी हो गए तो यहाँ बैठकर रो लेते है और अगर खुश होना हो, तो यहाँ बैठकर ही सपनों की दुनियाँ में चले जातें है।

सपनों की दुनियां में अक्सर मैं खिड़की का सपना देखता हूँ। और सपना मेरे बचपन का होता है। जिसमें होता है एक राजा और होती है एक रानी.. या कभी होती है कोई और कहानी। कहानी किसी चिड़िया की, जो छत पर नहा रही है या कभी दाना चुगने कहीं जा रही है। चिड़िया दाना चुगकर उड़ जाती है एक खुले आसमान की ओर.. वह आसमान जिसमें हम भी खुलकर उड़ना चाहते है।

लेकिन इस दुनियां में हम उतना ही उड़ सकते है, जितना हमनें अपने घर की खिड़की में से उड़ना सीखा है।
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- संजय, © 2018

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सपना

ज़िंदगी में हर कोई कुछ ना कुछ बनना चाहता है। कुछ बनने वाले सपना देखते है, और कुछ ना बनने वाले भी। कुछ सपने वर्तमान के होते है और कुछ भविष्य के। लेकिन सबसे बुरे होते है, भूतकाल के सपने.. बीते हुए कल के सपने, जो वाकई किसी भूत की तरह ही डराते है। लेकिन मुझे पसंद है वो सपना जो अतीत की यादों से शुरू हुआ हो और ज़िंदगी के अंत तक जाता हो।

मुझे सपने के अंदर, अपने सपने को देखना और उसके इर्दगिर्द अपनी जिंदगी जीना पसंद है।
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- संजय, 2018

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पतंग

कहते है पतंग का इतिहास कई साल पुराना है। लेकिन मेरा तो पतंग संग बचपन से ही याराना है। पतंग, जो हमें ख्वाब दिखाती है। ख्वाब होते है ज़िंदगी में ऊँचाइयां पाने के। ज़िंदगी में ऊँचाइयां सबकी ख्वाहिश होती है। और ख्वाहिशें अक्सर खानाबदोश होती है। वैसे कभी-कभी खानाबदोश होना अच्छा होता है। क्योंकि खानाबदोशी में चीज़ों को पकड़ कर नहीं रखा जाता, उन्हें आजाद छोड़ा जाता है। और आजादी तो हर पतंग का हक़ है। हक़ जो एक महीन धागे से बंधा होता है और हर उड़ाने वाले के हिसाब से बदलता रहता है।

हिसाब, जिसमें खींचोगे तो पतंग दौड़ी आएगी, लेकिन ढील दोगे तभी वह ऊपर जाएगी।
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- संजय, © 2018

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सफर

क्या ये अंत है? नहीं, ये अंत नहीं है। ये तो एक सफर है.. एक अंतहीन सफर है। सफर है, घर के आंगन में रिमझिम बारिश में भीगने से लेकर पनघट से पानी भरकर लाने तक। ठंड में ठिठुरते हाथों के अलाव जलाने से लेकर, तेज़ धूप में किसी पेड़ की छाँव ढूंढने तक। तुम चलते ही रहना। लगातार.. हर चुनौती का सामना करते हुए। हाँ, जब कभी थकने लगो तो देखना सितारों से भरे इस आसमान को और याद करना इस सफर की शुरुआत को। और फिर से आगे बढ़ते जाना। जीवन के अंत तक आगे बढ़ते जाना।

क्योंकि उससे आगे ही तुम्हें वो नायाब तोहफा मिलेगा जिसकी तलाश में लोग सफर किया करते है। वहाँ तुम्हें अंतहीन सुकून मिलेगा.. और इस कहानी का अंत भी।
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- संजय, © 2018

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सपनों का महल

एक कहानी है जिसे वह लिखता है। क्योंकि उसे पढ़ने का शौक रहा है और अपने शौक वह पूरे शगल से पूरे करता है। इसलिए अक्सर पढ़ता है। और पढ़ते-पढ़ते कुछ गढ़ता है। जो गढ़ता है वो एक सपना है।

खुली आँखों से देखा गया सपना। जो बंद आखों में भी नज़र आता है। जिसमें नज़र आती है दो आँखें, जो दुनिया की सबसे खूबसूरत आँखें है। शायद इन आँखों की कुछ बातें थी। जो वो नहीं बताता है।

वह बातें तो नहीं बताता है। फिर भी अक्सर छुप-छुपकर उन्हीं बातों को तरतीब से जमाता है। और बातें, वो तो इतनी शैतान हैं या कुछ-कुछ नादान है, जो हर बार बेतरतीब हो जाती है।

बातें, बेतरतीब हो जाती है। ठीक वैसे ही, जैसे वह अपनी प्रेमिका के खूबसूरत लंबे बालों को जब कान के पीछे सजाता है, और वो उतनी ही बार बिखर जातें है।

बिखर जाते है। जैसे बिखरता हैं सपनों का महल। जब दिल बस में ना हो तो सपनों के महल ताश के पत्तों से बनायें जातें है। जिन्हें भावनाएं कुछ ज्यादा ही मज़बूत बना देती हैं।

उस महल के पीछे वह, उसका इंतजार करता है। अचानक कोई आहट सुनाई देती है। और उसकी बैचैनी बढ़ जाती हैं। उस बैचेनी में उसे, वह आवाज़ सुनाई देती है। जिसका इंतजार वो कई जन्मों से कर रहा था।

तभी अचानक उसका महल बिखरने लगता हैं। उसे दर्द होता है, फिर भी वह उस टूटते महल को सम्हालने की कोशिश करता है। फिर भी उसकी प्रेमिका को आने में देर हो जाती है। आखिर बीती बातों की तरह उसके सपनों का महल ढह जाता है। और इस कहानी का अंत हो जाता है।

शगल : Hobby
गढ़ना : Manufacture
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- संजय, © 2018

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एक सीधा-सादा इंसान! घोर पारिवारिक! घुमक्कड़! चाय प्रेमी! सिनेमाई नशेड़ी! माइक्रो-फिक्शन लेखक!

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