संजय साेलंकी का ब्लाग

कभी कभी




कभी-कभी
हमें चलना होता है
तब भी,
जब कोई राह ना हो
और ना कोई राहगीर हो।
तब इस,
चलने की इस चाहत में
बिना पैरों के भी
हम नाप लेते है जीवन
जब चलते है पाँव-पाँव।


कभी-कभी
हमें तैरना होता है।
तब भी,
जब कोई नदी ना हो
और ना कोई किनारा हो!
तब भी,
इन लहरों को पार करके
हम तैरते जातें है
इस उम्मीद में,
कि आएगा कोई
आकर थामेगा हमारा हाथ
तब इस उम्मीद में
उथले बहते पानी में हम
चलने लगते है पाँव-पाँव।


कभी-कभी
हमें उड़ना होता है
तब भी,
जब कोई बादल ना हो
और उड़ने के लिए
ना ही खुला आसमान हो
ना किसी का संग हो
और ना ही अपना कोई पंख हो।


लेकिन फिर भी,
हम उड़ते है
क्योंकि इस जीवन में
कभी-कभी,
बिना पंखों के भी उड़ना पड़ता है।
और उड़ने की ख्वाहिश में
अक्सर इस
ज़मीन पर हम,
चलने लगते है पाँव-पाँव।


 


 

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पैरों के निशान..






एक भक्त था वह भगवान को बहुत मानता था, बड़े प्रेम और भाव से उनकी सेवा किया करता था, एक दिन भगवान से कहने लगा:

मैं आपकी इतनी भक्ति करता हूँ पर आज तक मुझे आपकी अनुभूति नहीं हुई।
मैं चाहता हूँ कि आप भले ही मुझे दर्शन ना दे पर ऐसा कुछ कीजिये की मुझे ये अनुभव हो की आप हो..
भगवान ने कहा ठीक है।

तुम रोज सुबह समुद्र के किनारे सैर पर जाते हो, जब तुम रेत पर चलोगे तो तुम्हे दो पैरो की जगह चार पैर दिखाई देगे,
दो तुम्हारे पैर होगे और दो पैरो के निशान मेरे होगे।
इस तरह तुम्हे मेरी अनुभूति होगी अगले दिन वह सैर पर गया, जब वह रे़त पर चलने लगा तो उसे अपने पैरों के साथ-साथ दो पैर और भी दिखाई दिये वह बड़ा खुश हुआ..
अब रोज ऐसा होने लगा।

एक बार उसे व्यापार में घाटा हुआ सब कुछ चला गया, वह रोड पर आ गया उसके अपनो ने उसका साथ छोड दिया।
देखो यही इस दुनिया की प्रॉब्लम है, मुसीबत में सब साथ छोड देते है।
अब वह सैर पर गया तो उसे चार पैरों की जगह दो पैर दिखाई दिये,
उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि बुरे वक्त मे भगवन ने साथ छोड दिया।
धीरे-धीरे सब कुछ ठीक होने लगा फिर सब लोग उसके पास वापस आने लगे।

एक दिन जब वह सैर पर गया तो उसने देखा कि चार पैर वापस दिखाई देने लगे।
उससे अब रहा नही गया..
वह बोला:
भगवान जब मेरा बुरा वक्त था तो सब ने मेरा साथ छोड़ दिया था पर मुझे इस बात का गम नहीं था क्योकि इस दुनिया में ऐसा ही होता है, पर आप ने भी उस समय मेरा साथ छोड़ दिया था, ऐसा क्यों किया?

भगवान ने कहा:
तुमने ये कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारा साथ छोड़ दूँगा, तुम्हारे बुरे वक्त में जो रेत पर तुमने दो पैर के निशान देखे वे
तुम्हारे पैरों के नहीं मेरे पैरों के थे, उस समय में तुम्हे अपनी गोद में उठाकर चलता था और आज जब तुम्हारा बुरा वक्त खत्म हो गया तो मैंने तुम्हे नीचे उतार दिया है, इसलिए तुम्हे फिर से चार पैर दिखाई दे रहे है।
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रहस्य

बचपन में अक्सर घर की दीवार पर, बिजली के मीटर में या घड़ी के ऊपर या कभी किसी रोशनदान में कोई ना कोई घोंसला दिख ही जाता था। उस घोंसले को देखकर बड़ा कौतूहल होता था, कौतूहल था ये देखना कि कैसे एक नन्हें से घोंसले में एक नन्हे से पंछी की एक नन्ही कहानी अपना जीवन जी रही है। कहानी, जो घर के अंदर से लेकर बाहर पेड़ों की ओटर तक में छुपी हुई है। ये अनकही कहानी और छुपे हुए घोंसलें मुझे आकर्षित करते रहे है। लेकिन आकर्षण घोंसलें का नहीं है, आकर्षण रहा है एक रहस्य का.. और ये रहस्य है एक कौवे का और एक कोयल का.. उनके प्रेम का या उनके वैमनस्य का।

रहस्य, जिसमें कोयल न तो कभी अपना घोंसला बनाती है और न ही कभी अपने बच्चे पालती है। वह तो हमेशा आजाद रहना चाहती है, और इसलिए बेफिक्र होकर बागों में यहाँ वहाँ फुदकती रहती है। और कुहू-कुहू करके प्रेम के गीत गाती रहती है। और जब प्रेम से उसका मन भर जाता है और उसके अंडे देने का समय आता है तो वह किसी कौवे के घोंसलें में जाकर उसके कुछ अंडो को नीचे गिराकर उनकी जगह अपने अंडे रख आती है। एक से अंडे होने के कारण बेचारा कौआ उन्हें पहचान नहीं पाता। और बच्चों का रंग भी मिलता-जुलता रहता है, इस कारण जब तक बच्चे बोलने नहीं लगते, तब तक वह उन्हें पहचान नहीं पाता।

लेकिन जैसे ही कौवे को यह पता चलता है कि वह जिसकी देखभाल कर रहा है वह कौवे का बच्चा, उसका अपना बच्चा नहीं बल्कि पराई कोयल है.. तो वह उसी वक़्त उन बच्चों को बड़ी ही बेदर्दी के साथ घोंसले से नीचे गिरा देता है। और ऐसा हर कोयल के साथ होता है। कभी किसी के साथ जल्दी, तो किसी के साथ देर से। कोई कोयल मर जाती है। तो कोई घोंसले से गिरने के बाद भी कुहकुहाने के लिए बच जाती है।

यह क्रम अनवरत चलता रहा है और आगे भी यूँ ही चलता रहेगा। और इसी के साथ बना रहेगा एक रहस्य.. रहस्य कि जब दोनों पंछी ही एक जैसे है तो दोनों एक साथ क्यों नहीं रह सकते? रहस्य की उनमें भेद किसने किया? रहस्य की क्या वो अपने समाज से डरते है? रहस्य कि कौवा किस जाति का है और कोयल किस जाति की?

और यह रहस्य तो हमेशा एक रहस्य ही बना रहेगा। लेकिन हकीकत है तो बस इतनी ही कि कोयल अपनी मर्ज़ी से जीवन जीना चाहती है, इसलिए वह शादी में यकीन नहीं रखती और कौवा एक सामाजिक प्राणी है, इसलिए वह कभी लव मैरिज नहीं करता।

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कल

अगर कल
दिन बुरा था
तो रुकिये
गहरी सांस लीजिये
और उम्मीद रखिये
की आज दिन
बहुत अच्छा होगा।
और अगर
कल का दिन
अच्छा ही था
तो रुकिये नहीं
हो सकता है कि
सफलता का सिलसिला
अभी बस शुरू हुआ ही हो।


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- संजय © 2018


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यादें

ना मिटाओ मेरी यादों को
मेरी जगह दे दो
किसी ओर को
ऐसा तुमनें कहा था
लेकिन तुम्हें पता नहीं
ये सब इंसान के हाथों में नहीं
इसलिए शायद मुश्किल हैं
मुश्किल है, शायद नामुमकिन
क्योंकि तुम्हारी यादें
महज़ कोई याद नहीं
वो तो यादों से भरा
एक घोंसला है
और उस घोंसले में
अपना घर बनाकर
हर रोज़ मैं रहा करूँगा

वह घर
जो लगता है
अपना सा
किसी नए सपने सा
हाँ, जीवन के इस वृक्ष में
जब कोई पंछी रहने आएगा
मैं लाकर दूँगा उसे दाना-पानी
रखूँगा खूब ख्याल
कभी साथ खेलूँगा
तो कभी कोई गीत सुनाऊंगा

गीत सुनते हुए
समय दौड़ेगा
तेज़ रफ़्तार से
और वृक्ष फले-फूलेगा
बड़े ही प्यार से
लेकिन अबके जो आएगा
वो बनाएगा
एक नया घोंसला
जो होगा
पिछले घोंसले से बेहतर
बेहतर होंगे तिनके
और बेहतर होगी दुनिया
जिसमे वो नया पंछी गायेगा
और दुनिया को
अपनी मौजूदगी का एहसास कराएगा
उसमें होगी लाखों खूबियां
वो खुशियों को
एक नए सिरे से सजायेगा
फिर भी तुम्हारी जगह
कोई और नहीं ले पायेगा

जीवन के खेल में
कोई दूसरा मौका नहीं मिलता
इसलिए इस कमी को भरने के लिए
हर रोज़
कतरा-कतरा
कुछ यादें मिटा रहा हूँ
वजह चाहे जो भी हो
तुम्हारी यादें मेरी निजी है
ठीक वैसे ही
जैसे मेरा जीवन
अब किसी ओर की निधि है
चाहे मैं खुद
तुम्हें भूल जाऊँगा
लेकिन तुम्हारी जगह
किसी ओर को नहीं दे पाउँगा!
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- संजय © 2018


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उम्मीद

मेरी नींद के अंदर भी एक नींद है। वह नींद जिसमें ढेरो किस्से पलते है और ख्वाब उन्हें पंखे झलते है। ख्वाब जिनमें जागने से पहले मैं कोई और होता हूँ और जागते ही उन यादों को मैं खो देता हूँ। घर का ठंडा फर्श और बाहर के बरसते बादल एहसास कराते है कि आज फिर कोई ख्वाब टूटा है। इस उम्मीद में कि वो ख्वाब फिर दोबारा आएगा, मैं फर्श पर पैर रखने से पहले, धीमे-धीमे ख्वाबों के किरचें उठाकर करीने से सजाता हूँ।

....और एक नई रात की उम्मीद में एक नए दिन की ओर कदम बढ़ाता हूँ।
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- संजय, 2018

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तलाश

खुद की तलाश में अक्सर खुद को पहले लिखना होता है। मैं बहुत दिनों के बाद लिखने बैठा हूँ। लग रहा है जैसे कुछ दिन पहले ही की तो बात है.. मैं या तो लिख रहा था या फिर लिखना चाह रहा था। देखो! अभी भी मैंने कुछ लाइने उकेरी थी, लेकिन अब मैं उन्हें मिटा रहा हूँ। क्योंकि मैं अब लिखता नहीं। अब मैं खोजता हूँ।

मैं खोजता हूँ एकाकी परछाइयों में, और कभी अपने मन की गहराइयों में.. फिर जब खोजते-खोजते मैं थक जाता हूँ, तो मैं खुद को खुद से दूर पाता हूँ। लगता है मेरी खुद की खुद से ही लड़ाई हो गई है। मेरे भीतर कहीं कोई फांस चुभ गई है, और मेरा गला सूखने लगा है। अब मैं गला तर करने के लिए चाय बनाता हूँ। चाय में उबलते बुलबुलों को देखकर मन में कई ख्वाब उबलते है। ख्वाब जिनमें मेरे कुछ दोस्त-यार और कुछ रिश्तेदार है.. जिनसे खूब बातें होती है, खूब हँसी-मज़ाक भी और बेवजह का रोना-गाना भी। लेकिन बातों ही बातों में इन सबके बीच से मैं गायब हो रहा हूँ। क्योंकि मुझे लड़ने जाना है।

अब मैं सुपर मारियो हूँ। और जीवन के युद्ध में मुझे लगातार लड़ते जाना है। वह जीवन, जिसमें कोई लाईफलाइन भी नहीं है.. मैं लड़ रहा हूँ, रास्तें में आ रही हर कठिनाई को, हर हार को पार करके.. मैं बस जीतना चाहता हूँ। क्योंकि इस खेल में मैं अकेला नहीं हूँ, इसमें एक रानी भी है, जिसे मुझे जीताना है। उसे जीताना है क्योंकि इस खेल में उसकी जीत ही मेरी जीत है।

और खेल तो अब भी खत्म नहीं हुआ, लेकिन मैं जान जाता हूँ.. यहाँ जीत-हार मायने नहीं रखता, मायने रखता है तो बार-बार इस जीत-हार के सफर पर जाना.. ठीक वैसे ही जैसे खुद की तलाश में खुद को पा लेना जरूरी नहीं, जितना जरूरी है खुद को तलाश करना।

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- संजय © 2018

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एक सीधा-सादा इंसान! घोर पारिवारिक! घुमक्कड़! चाय प्रेमी! सिनेमाई नशेड़ी! माइक्रो-फिक्शन लेखक!

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